कर्म, प्रारब्ध, संस्कार व नियति...
"प्रारब्ध और संस्कारों के अनुकूल भोग करता जीवन, नए संस्कारों की नींव डालता जाता है परंतु वह करता कुछ नहीं, सब कुछ एक महान शक्ति के गुरुत्वाकर्षण में होता रहता है। मनुष्य तो कर्मानुकूल संस्कारों द्वारा निर्मित एक खिलौना मात्र है। " (महायोगी पायलट बाबा ) {...