मन के बारे में हम अक्सर सुनते हैं की मन बड़ा चंचल है, स्थिर नहीं, इसमें ठहराव नहीं, इसे आराम नहीं... इस पल घर के विषय में विचार करता है तो दूसरे पल दुनिया का विचार, इसे एक स्थान या एक विचार पर रहना पसंद नहीं इसलिए इसे बंदरनुमा मन भी कहा जाता है। बंदरनुमा क्योंकि बंदर एक डाल पर इस पल और दूसरी डाल पर दूसरे पल होता है उसी प्रकार मनुष्य का मन भी कभी स्थिर नहीं रहता है। किसी भी व्यक्ति से जब हम बात करते हैं या फिर हम जब एकांत में स्वयं से ही बात करते हैं तो हमें यह ज्ञात भी नहीं कि अनेकों बार एक शब्द को प्रयोग में लाते हैं और वह शब्द है 'मन'। आज मेरा 'मन' कुछ चटपटा खाने का है, 'मन' बहुत दुखी है, 'मन' विचलित है 'मन'आज अत्यधिक प्रसन्न है इत्यादि इत्यादि । प्रत्येक व्यक्ति 'मन शब्द' को प्रयोग में लाता हैं, मनुष्य मन की शक्ति के प्रभाव में काम करता है परंतु इस बात से अनभिज्ञ है कि आखिरकार ये "मन है क्या"?? जब हम कहते हैं कि 'मन' आज मेरा अधिक सोने का हैl तो इस पर विचार करे की 'मेरा' सोने का मन हैं... 'मेरा...
जब भी साधना की चर्चा होती हैं तो इस के तहत की जाने वाली ब्रह्मचर्य साधना को अधिक कठिन और नियमों के अनुरूप चलने वाली साधना के रूप में जाना जाता हैं। ब्रह्मचर्य एक ऐसी साधना हैं जिसे ना सिर्फ सनातन धर्म के ष्ठ : दर्शनों में योग दर्शन के तहत अष्टांग योग में विशेष स्थान प्राप्त है, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी ब्रह्मचर्य को विशेष और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं। ज़ब इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं की वैदिक काल के समय जीवन को सुव्यवस्थित ठंग से जीने हेतु अत्यंत सुन्दर तरीके से विभाजित किया गया- * ब्रह्मचर्य( 5 वर्ष से लेकर 25वर्ष तक ) * गृहस्थ ( 25 से 50 वर्ष तक ) * वान प्रस्थ ( 50 से 75 तक ) * संयस्थ (75 से...) अतः हमने देखा की ब्रह्मचर्य साधना का कई धर्मों में विशेष स्थान हैं। किन्तु सामान्य जीवन में हम कही ना कही इस विषय पर चर्चा करने से कतराते हैं या संकोच करते हैं। तो आज हम इस लेख में ब्रह्मचर्य का अर्थ और इसके महत्व को जनाने का प्रयास करेंगे। ब्रह्मचर्य को यदि सरल भाषा में समझें तो यह दो शब्दों का मेल हैं - ब्रह्म और चर्य, 'ब्रह्म' अर्थात सर्वस्य, सर्...
अष्टांग योग साधना के अंतिम पढ़ाव में हम अंतरंग साधना के अंतर्गत आने वाले धारणा, ध्यान व समाधि को जानेंगे। पूर्व के लेखों में हमने जाना किस प्रकार साधक स्वयं के चित्त को शुद्ध कर आसन, प्राणायाम व प्रत्याहार का अभ्यास करते हुए चित्त की चंचलता को स्थिरता में ला अष्टांग योग के उच्चोत्तर अंग धारणा, ध्यान व समाधि की ओर अग्रशील होता एवं इन्हें सिद्ध करते हुए जीवन और योग के परम लक्ष्य समाधि को प्राप्त कर सकता हैं। धारणा... अंतरंग साधना में धारणा ध्यान के पूर्व की तैयारी हैं, प्रत्याहार में हमने जाना इन्द्रियों के विषयों को अंतर्मुख करना प्रत्याहार हैं एवं इस अवस्था किसी एक विषय को ध्येय बनाकर मन को एकाग्र करने की अवस्था 'धारणा' हैं। धारणा संस्कृत के 'धृ' धातु से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं - 'आधार व नीव '। धारणा अर्थात 'ध्यान की नीव' व 'ध्यान की आधारशिला' हैं। महर्षि पतंजलि धारणा के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए बताते हैं - देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ ३.१॥ चित्तस्य - चित्त को देश - आंतरिक /शरीर स्थित किसी स्थान (नाभि, हृदय या माथे) पर बन्ध:- बा...
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