मन के बारे में हम अक्सर सुनते हैं की मन बड़ा चंचल है, स्थिर नहीं, इसमें ठहराव नहीं, इसे आराम नहीं... इस पल घर के विषय में विचार करता है तो दूसरे पल दुनिया का विचार, इसे एक स्थान या एक विचार पर रहना पसंद नहीं इसलिए इसे बंदरनुमा मन भी कहा जाता है। बंदरनुमा क्योंकि बंदर एक डाल पर इस पल और दूसरी डाल पर दूसरे पल होता है उसी प्रकार मनुष्य का मन भी कभी स्थिर नहीं रहता है। किसी भी व्यक्ति से जब हम बात करते हैं या फिर हम जब एकांत में स्वयं से ही बात करते हैं तो हमें यह ज्ञात भी नहीं कि अनेकों बार एक शब्द को प्रयोग में लाते हैं और वह शब्द है 'मन'। आज मेरा 'मन' कुछ चटपटा खाने का है, 'मन' बहुत दुखी है, 'मन' विचलित है 'मन'आज अत्यधिक प्रसन्न है इत्यादि इत्यादि । प्रत्येक व्यक्ति 'मन शब्द' को प्रयोग में लाता हैं, मनुष्य मन की शक्ति के प्रभाव में काम करता है परंतु इस बात से अनभिज्ञ है कि आखिरकार ये "मन है क्या"?? जब हम कहते हैं कि 'मन' आज मेरा अधिक सोने का हैl तो इस पर विचार करे की 'मेरा' सोने का मन हैं... 'मेरा...
अष्टांग योग साधना के अंतिम पढ़ाव में हम अंतरंग साधना के अंतर्गत आने वाले धारणा, ध्यान व समाधि को जानेंगे। पूर्व के लेखों में हमने जाना किस प्रकार साधक स्वयं के चित्त को शुद्ध कर आसन, प्राणायाम व प्रत्याहार का अभ्यास करते हुए चित्त की चंचलता को स्थिरता में ला अष्टांग योग के उच्चोत्तर अंग धारणा, ध्यान व समाधि की ओर अग्रशील होता एवं इन्हें सिद्ध करते हुए जीवन और योग के परम लक्ष्य समाधि को प्राप्त कर सकता हैं। धारणा... अंतरंग साधना में धारणा ध्यान के पूर्व की तैयारी हैं, प्रत्याहार में हमने जाना इन्द्रियों के विषयों को अंतर्मुख करना प्रत्याहार हैं एवं इस अवस्था किसी एक विषय को ध्येय बनाकर मन को एकाग्र करने की अवस्था 'धारणा' हैं। धारणा संस्कृत के 'धृ' धातु से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं - 'आधार व नीव '। धारणा अर्थात 'ध्यान की नीव' व 'ध्यान की आधारशिला' हैं। महर्षि पतंजलि धारणा के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए बताते हैं - देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ ३.१॥ चित्तस्य - चित्त को देश - आंतरिक /शरीर स्थित किसी स्थान (नाभि, हृदय या माथे) पर बन्ध:- बा...
"मनुष्य की अंतरनिहित पूर्णतः को अभीव्यक्त करना ही शिक्षा हैं। " स्वामी विवेकानंद शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या और किस प्रकार वह मनुष्य के ज्ञान अर्जन हेतु सहायक हैं, इसे समझना भी अत्यंत आवश्यक है क्योंकि आज इस कलयुगी वातावरण में शिक्षा का अर्थ डिग्री को संग्रहित कर नौकरी पाने और पैसा अर्जित करने तक सिमित कर दिया गया हैं। आज जिस के पास जितनी अधिक डिग्री होंगी वह उतना पड़ा लिखा और श्रेष्ठ कहलाता हैं, ये मायने नहीं रखता की उसने डिग्री कैसे प्राप्त की और वास्तव में वह कुछ योग्य भी है या नहीं। इस प्रकार कई उदाहरण आज कल देखने को मिलते हैं, जिन्हें देख वह व्यक्ति शिक्षित हैं भी या नहीं शंका होती है। अभी कुछ माह पूर्व ही तथाकथित पार्टी के एक चर्चित नेता द्वारा देश के प्रधानमंत्री जी को अनपढ़ और अशिक्षित (उनके द्वारा लिए गए तात्कालिक निर्णय के विरुद्ध )बोल कई प्रकार से कई अन्य गलत भाषा शैली का प्रयोग किया गया। यह सब देख मैं अत्यंत अचंभित हुई और विचार करने लगी की इस प्रकार एक चर्चित पार्टी के चर्चित नेता द्वारा लाइव टीवी पर आकर अनियंत्रित भाषा का प्रयोग कर देश के प्रधान...
Comments
Post a Comment
please do not enter any spam link in the comment box.