शिक्षा

"मनुष्य की अंतरनिहित पूर्णतः को अभीव्यक्त करना ही शिक्षा हैं। "
स्वामी विवेकानंद 
शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या और किस प्रकार वह मनुष्य के ज्ञान अर्जन हेतु सहायक हैं, इसे समझना भी अत्यंत आवश्यक है क्योंकि आज इस कलयुगी वातावरण में शिक्षा का अर्थ डिग्री को संग्रहित कर नौकरी पाने और पैसा अर्जित करने तक सिमित कर दिया गया हैं। आज जिस के पास जितनी अधिक डिग्री होंगी वह उतना पड़ा लिखा और श्रेष्ठ कहलाता हैं, ये मायने नहीं रखता की उसने डिग्री कैसे प्राप्त की और वास्तव में वह कुछ योग्य भी है या नहीं।

इस प्रकार कई उदाहरण आज कल देखने को मिलते हैं, जिन्हें देख वह व्यक्ति शिक्षित हैं भी या नहीं शंका होती है। अभी कुछ माह पूर्व ही तथाकथित पार्टी के एक चर्चित नेता द्वारा देश के प्रधानमंत्री जी को अनपढ़ और अशिक्षित (उनके द्वारा लिए गए तात्कालिक निर्णय के विरुद्ध )बोल कई प्रकार से कई अन्य गलत भाषा शैली का प्रयोग किया गया।

यह सब देख मैं अत्यंत अचंभित हुई और विचार करने लगी की इस प्रकार एक चर्चित पार्टी के चर्चित नेता द्वारा लाइव टीवी पर आकर अनियंत्रित भाषा का प्रयोग कर देश के प्रधानमंत्री जी को अनपढ़ और अशिक्षित कहना ये क्या शिक्षित, सभ्य व्यक्ति और सभ्य समाज के गुण हैं..? और यदि ऐसी शिक्षा और डिग्री प्राप्त करने के लिए हम सभी प्रयास रत हैं तो तत्काल ऐसी शिक्षा को ग्रहण करना हम सब को बंद कर देना चाहिए और विचार कर अपने अतीत में जा कर खोजना चाहिए की शिक्षा का वास्तविक अर्थ और महत्व क्या हैं।

शिक्षा’ शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया।शिक्षा मनुष्य की उन अंतरनिहित क्षमताओं से साक्षात्कार करने का माध्यम हैं जिससे मनुष्य अपनी पूर्णतः को प्राप्त कर व्यापक रूप से ना सिर्फ स्वयं के लिए बल्कि समाज राष्ट्र और विश्व में परिवर्तन ला सकता है। किन्तु आज तो शिक्षा का अर्थ ही विकृत कर दिया गया।


शिक्षा का वास्तविक महत्व

हमने जाना शिक्षा को माध्यम बना मनुष्य अपने भीतर की अपूर्णतः को पूर्णतः में परिवर्तित कर, विकशील हो एक विकसित, सभ्य, अचारणशील समाज व राष्ट्र का निर्माण कर सकता हैं। क्योंकि शिक्षा ही राष्ट्र निर्माण और पतन दोनों का कारण हैं। यदि भारत का ही उदाहरण देखे तो भारत ज्ञान और शिक्षा से सदैव संपन्न रहा। ज्ञान ही है जो शिक्षा का आधार हैं। ज्ञान की परम्परा सदियों से हमारे यहाँ चली आ रही हैं या ये भी कहें की भारत वेद अर्थात ज्ञान की जननी हैं तो अतिस्योक्ति नहीं ।

ज़ब भी किसी राष्ट्र पर घात किया जाता हैं तो सबसे पहले उसकी शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार किया जाता हैं, ऐसा ही भारत देश के साथ हुआ। 1000 वर्ष गुलमी की जंजीरों में जकड़ा भारत पर पूर्व में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार करते हुए हमारे उन प्राचीन विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया जो उस समय अपनी शिक्षा पद्धति, ज्ञान परम्परा, श्रेष्ठ आचार्य के लिए अग्रीण स्थान रखते थे, इनमे प्रमुख थे - तक्ष्यशिला विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय। इसके उपरांत जो रही सही कसर रही उसे अंग्रेजो ने हमारी शिक्षा व्यवस्था पर पुरजोर प्रहार देकर 1835 में पूर्णतः पश्चायत शिक्षा व्यवस्था को लागू किया, जो आज तक लागू है।

हमने देखा मौर्य और गुप्तकाल में देश का हर पहलु से सक्षम होना चाहे आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्र में भारत ना सिर्फ अग्रीण रहा बल्कि अन्य देशों का पथ प्रदर्शक भी रहा और यही हमारे देश को उस समय, संपन्न, वैभवशाली, चित्नशील बनाता था इन सब का मुख्य आधार शिक्षा ही थी, और ज़ब शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्थ किया गया तो भारत की अवनति का कारण भी शिक्षा ही रही।

अतः हमने जाना शिक्षा क्या हैं और शिक्षा के क्या मायने है ना सिर्फ व्यक्तिगत रूप से बल्कि समग्र कल्याण को देखते हुए।

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