विश्व शांति हेतु यज्ञ की महत्वता....
भारतीय दर्शनशास्त्र तथा धार्मिक ग्रंथो मैं यज्ञ की प्रक्रिया को विश्व मैं शांति स्थापित करने का प्रमुख साधन माना गया हैं...
यज्ञ एक प्रकार का एक विज्ञान हैं, जिस प्रकार अमुक स्वर -विन्यास से युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग -रागनियां बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है......उसी प्रकार यज्ञ के दौरान ब्रम्हांड की समस्त शक्तिओ का आवाहन कर.. मंत्रउच्चारण के साथ उत्पन्न हुई विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगो का प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति, सूक्ष्म जगत तथा प्राणियों के स्थूल और सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता हैं... तथा ये शक्ति और ध्वनि आकाश मैं व्याप्त हो कर लोगों के अंतकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती हैं...
ऋषियों ने "अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः" (अथर्ववेद 9.15.14) कहकर यज्ञ को संसार की सृष्टि का आधार बिंदु कहा है।
यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का सत्य प्रयोजन तथा वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए संगठित करना भी है. आज मानव अनेकों प्रकार से अशांत है, नकारात्मकता का वातावरण हर जगह व्याप्त है, इस प्रकार यज्ञ को माध्यम बनाकर वातावरण शुद्ध व शांति स्थापित की जाती है.
यज्ञ कई प्रकार से इस समस्त संसार हेतु लाभकारी है जैसे यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्व वायुमंडल में फैलाए जाते हैं उनसे हवा में व्याप्त असंख्य रोग, कीटाणु स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं अतः रोग एवं महामारी से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है. यज्ञ से उत्पन्न वायु संपूर्ण जगत व प्राणियों को सुरक्षा कवच उपलब्ध कराती है.
गीताकार श्रीकृष्ण ने कहा है :
"सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोडस्त्विष्ट कामधुक्"
यज्ञ की उष्मा मनुष्य के अंतः करण पर देवत्व की छाप डालती है जहां यज्ञ होते हैं वहां भूमि व क्षेत्र सुसंस्कारों की छाप अपने अंदर स्थापित कर लेती है वहां जाने वालों पर भी दीर्घ काल तक प्रभाव डालती है.
कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्म से विकृत महा दोषों से यज्ञ में भारी सुधार होता है. यज्ञ का एक बड़ा महत्व है "संकल्प से सिद्धि" यज्ञ संकल्प के माध्यम से बड़े से बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है, जैसे विश्व में शांति स्थापित करने का संकल्प, राष्ट्र की सुरक्षा का संकल्प या फिर महामारी से रक्षा हेतु भी यज्ञ में संकल्प को माध्यम बनाकर मानव कल्याण व शांति स्थापित करने की ओर कदम बढ़ाये जाते है.
इस प्रकार यज्ञ को शास्त्रों में सर्व श्रेष्ठ कर्म कहा गया है. इसकी सुगंध समाज को सु -संगठित कर एक सुव्यवस्था देती है जो कि राष्ट्र व विश्व में शांति स्थापित करने में सहायक सिद्ध होती है......
" येन अमृतेन इदं भूतं भुवनं भविष्यत् सर्वं परिगृहीतं येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

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