वेराग्य और अनासक्ति.....
ईश्वर ने जब इस जगत की रचना की तो इस सृष्टि की संकल्पना को पूर्ण करने हेतु योनियों का सृजन किया। भारतीय शास्त्रों के अनुसार इस सृष्टि पर 8400000 योनियों है, इन सभी योनियों से होकर मनुष्य को मुक्ति (मोक्ष )की प्राप्ति होती है।
इनमें से मनुष्य योनि को सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि एकमात्र मनुष्य योनि के द्वारा ही जीव अपने अंतिम गंतव्य मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। शास्त्रों का कथन हैं कि मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मनुष्य जीवन से ही होकर गुजरता है, क्योंकि एक मात्र मनुष्य को ईश्वर ने 'विवेक' दिया है..... विवेक के माध्यम से ही उसके मोक्ष के द्वार खुलते हैं।
शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति के चार साधनों का वर्णन है....
" नित्यानित्यवस्तुविवेक:। इहामुत्रार्थफलभोगविराग :।शमादिषट्क सम्पति :मुमुक्षत्वं चेति। "
नित्य अनित्य वस्तु विवेक इस और परलोक के भोग से वैराग्य, शमादि छ : संपत्ति और मुमुक्षा है। गुरु आदि शंकराचार्य ने इसका विस्तार से वर्णन अपनी पुस्तक "विवेक चूड़ामणि "में किया है। मोक्ष की प्राप्ति हेतु जो मनुष्य आध्यात्मिक जीवन में आगे कदम बढ़ाते है, उनका वैराग्य के मार्ग से होकर गुजरना स्वाभाविक है।
वैराग्य या अनासक्ति सामान्यता ये एक ही सिक्के के दो पहलू है। अनासक्ति से ही वैराग्य का मार्ग खुलता हैं। ....वैराग्य क्या है ??
जिसके मन में ना राग, ना द्वेष है और ना राग-द्वेष रहित होने का अहंकार वही सही मायनों में वैरागी कहा जाएगा।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2.56॥
भावार्थ : दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥56॥
ईश्वर द्वारा रचित यह संसार एक नाटक व मायाजाल है, जो मनुष्य इसमें रहते हुए भी इस के माया जाल से विरक्त रहता है.. वही सच्चा वैरागी है, जिस मनुष्य को संसार की कोई भी वस्तु आकर्षित ना करें सके वही सच्चा वैरागी है। विषयों में अनासक्ति ही वैराग्य है विषय -रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द जब इन पांचों में आसक्ति मोह राग स्वार्थ में प्रीति हो जाती है तो व्यक्ति रागी हो जाता है, तथा जब इन से विमुक्ति छुटकारा होता है तो व्यक्ति वैरागी हो जाता है।
भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भभयं
मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाभयम् ।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।। (- वैराग्यशतकम् ३१ )
( अर्थ - भोग करने पर रोग का भय, उच्च कुल मे जन्म होने पर बदनामी का भय, अधिक धन होने पर राजा का भय, बलशाली होने पर शत्रुओं का भय, रूपवान होने पर वृद्धावस्था का भय, शास्त्र मे पारङ्गत होने पर वाद-विवाद का भय, गुणी होने पर दुर्जनों का भय, अच्छा शरीर होने पर यम का भय रहता है। इस संसार मे सभी वस्तुएँ भय उत्पन्न करने वालीं हैं। केवल वैराग्य से ही लोगों को अभय प्राप्त हो सकता है।)
अष्टावक्र गीता में राजा जनक ऋषि अष्टावक्र से प्रश्न करते हैं... हे भगवन ! विषय भोग के त्यागने से शरीर नहीं रह सकता और जितने बड़े-बड़े ऋषि, राज ऋषि हुए उन्होंने भी इनका त्याग नहीं किया और वह आत्म ज्ञान को प्राप्त हुए और भोग भी भोगते रहे, फिर एक आम नागरिक के लिए इन्हें त्यागना कैसे संभव हैं. अष्टावक्र जी कहते हैं कि हे राजन आपका कहना सत्य एवं स्वरूप से विषय भी नहीं त्यागे जाते परंतु इनमें जो अति आसक्ति है अर्थात 5 विषयों में से किसी एक के प्राप्त होने से क्षेत्र की व्याकुलता होना और सदैव उसी में मन का लगे रहना आसक्ति है, उसके त्याग का नाम ही विषयों का त्याग है एवं जो प्रारब्ध भोग से प्राप्त हो उसी में संतुष्ट होना, उनमें दोष -दर्ष्टि, ग्लानि ना होना इसी का नाम वैराग्य है।
अनासक्ति क्या है, इसे समझने से पूर्व आसक्ति को समझना होगा.. आसक्ति क्या है...? राग अर्थात किसी भी वस्तु, स्थान, व्यक्ति से अशक्त होकर अत्यधिक लगाव हो जाना, सदा जिसके खोने का भय रहना ,अपेक्षाओ का प्रकटीकरण होना आसक्ति कहलता हैं, तथा अपेक्षाओ के टूटने से द्वेष उत्पन्न होता है जो पुनः जन्म का कारण बनकर मोक्ष के मार्ग हेतु बाधा हैं। ऋषि पतंजलि ने पांच कलेशों में राग द्वेष का विस्तृत वर्णन किया है
पतंजलि महर्षि के अनुसार, राग-द्वेष भी एक महत्वपूर्ण पीड़ा है। पाँच विपत्तियाँ हैं अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकारवाद), राग-द्वेष (जैसे पसंद और नापसंद) और अभिज्ञान (जीवन से चिपटना)। सबसे पहले, अज्ञान है, मूल अविद्या। इससे अहंकार का जन्म होता है, अस्मिता का, और अस्मिता का जन्म राग-द्वेश से होता है, और राग-द्वेश, अभिनीषा से या इस जीवन से चिपके रहने से।
पतंजलि महर्षि कहते हैं: "अभ्यसवैराग्यभ्यम् तन्निरोधः- "मन ध्यान या साधना और वैराग्य द्वारा नियंत्रित होता है।" वे अमर के दायरे में चढ़ने की आकांक्षा के दो पंख हैं। यही बात भगवान कृष्ण भी कहते हैं:
अभ्यसेन तु कैन्यत्य, वैराग्यं च गृह्यते- "मन अभ्यास और तिरस्कार और तीव्र वैराग्य से नियंत्रित होता है।" वैराग्य द्वारा, मन को अलग कर दिया जाता है। वह जो एक अलग तरीके से काम करता है, वह कर्म (कार्रवाई) से बाध्य नहीं है। तो इस एक गुण, या साधना-उर्फ़-वैराग्य को साधना महाप्राणों का कर्तव्य है।...
आसक्ति का विपरीत अनासक्ति हैं...
राग और द्वेष से असंपृक्त हो जाना अनासक्ति है। मनुष्य आदतन आसक्ति और विरक्ति के मध्य झूलता है। या तो वह किसी चीज की ओर आकर्षित होता है या विकर्षित, परंतु वह यह नहीं जानता कि इन दोनों से बड़ी बात है कि कर्तव्य कर्म करते समय निष्पृह भाव में चले जाना। यही अनासक्त भाव है। विरक्ति वास्तव में आसक्ति का दूसरा हिस्सा है। आज जिस वस्तु के प्रति आसक्ति है, कल उससे विरक्ति हो सकती है। अनासक्ति इन दोनों से ऊपर है। अनासक्ति की भाव दशा में चीजें हमें न बुलाती हैं और न भगाती हैं। हम दोनों के मध्य अनासक्त खड़े हो जाते हैं। बुद्ध ने इसे 'उपेक्षा' कहा है। न कोई राग है और न विराग। भोगवाद और वैराग्यवाद दोनों अतियां हैं। भोग में वैराग्य का भाव ही निष्काम कर्म है। भोजन तो करना ही है। जरूरत है भोजन में त्याग का भाव। भोजन में स्वाद की तलाश करना बुरा है। अनासक्त साधक सांसारिक घटनाओं का केवल साक्षी है- तटस्थ द्रष्टा है। वह एक गवाह की तरह जिंदगी में विचरता है। उसके भीतर न चिंता है, न दुख है और न ही द्वंद्व की तरंगें। अनासक्त कर्मयोगी के जीवन में जो तरंगें उठती हैं, वे स्वभाव से मंगलकारी होती हैं। कर्मयोगी 'कर्तव्य कर्म' करते हुए आसक्ति और विरक्ति के बीच से बेदाग निकल जाता है।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर !
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः !! गीता 3/19
अर्थ - इसलिए आसक्ति रहित होकर कार्य को भलीभांति करते रहो; क्योंकि अनासक्त होकर निरंतर कर्म (निष्काम कर्म) करने से मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है ! 3 /19
वैराग्य और आसक्ति प्रतेक मनुष्य के जीवन मैं महतवपूर्ण परिस्थितियां हैं... चाहे वह आध्यात्मिक मार्ग पर चल कर मोक्ष पाने की इक्षा हो या फिर भौतिक जीवन मैं सफलता पाने की चाहा... वरन हम ये केह सकते ये दोनों ही स्थितिया हमें आंतरिक शक्ति प्रदान कर जीवन मैं किसी भी परिस्थिति का सामना निर्भीकता से करना सिखाती हैं।

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