प्रार्थना








ईश्वर व मानव के मध्य की डोर जिस भक्ति पूर्ण संवाद से जुड़ी होती है वह 'प्रार्थना' कहलाती है, अर्थात ईश्वर व भक्त के बीच का संवाद प्रार्थना है। आध्यात्म एक मानसिक प्रक्रिया है उस परम तत्व, परम सत्य को प्राप्त करने की जो अदृश्य है एवं जिसकी खोज हेतु मानव आध्यात्मिक मार्ग का सहारा लेता है।


मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों पर निर्भर करती है उसके यही संस्कार उसे असत्य से सत्य की ओर चलने हेतु मार्ग प्रशस्त करते हैं। या फिर जो व्यक्ति जीवन में अत्यधिक दुख, कष्ट व बार बार जीवन के अनेकों पढ़ाव पर ठोकर खाता है तो वह उन कारणों को गहराई से जानने का प्रयास करने लगता है कि मैं ही क्यों? मुझे ही इतना कष्ट क्यों?  दुख क्यों? दुख क्या है? सुख क्या है??? इत्यादि इत्यादि। इन्हीं प्रश्नों -उत्तरों की खोजों उसे जाने-अनजाने आध्यात्मिक यात्रा की ओर ले जाती है।

आध्यात्मिक यात्रा की और जो व्यक्ति दृढ़ता के साथ बढ़ता है तो उसे के समक्ष जो प्रथम कार्य होता है वह स्वयं का आत्म विश्लेषण करना , मनुष्य को स्वयं से ऊपर उठकर.. स्वयं के अस्तित्व से परे जा अहंकार पर विजय पानी होती हैं।

गीता में वर्णित है ये आंतरिक युद्ध हैं, शताब्दियों से जमा हो रहा है कीचड़ से सना मानवीय मन शाश्वत सत्य को पाने में पूर्णतः से असमर्थ होता है। यहां युद्ध क्षेत्र की भीषण लड़ाई भी फीकी पड़ जाती है जब मनुष्य पहली बार अपने अंतर शत्रुओं का विरोध करता है... ये कोई साधारण शत्रु नहीं जिन्हें सुसज्जित सेनाओं की सहायता से काबू किया जा सके, ये अनंत जन्मों के मलिन संस्कार है जो आज हमें सत्य की खोज करने में आड़े आते हैं।

इस स्थिति में अपनी आध्यात्मिक यात्रा में संघर्ष नहीं करना वरन उस परमात्मा, ईश्वर, अनंत के समक्ष समर्पण करना होगा, जो सृष्टि का रचयिता है, सृष्टि का पालन करता है। उसके बनाये गये अनंत ब्रह्मांड में हम जीवात्मा एक तिनका मात्र भी नहीं...

जरा कल्पना कीजिए कि एक बड़े तूफान में कोई तिनका क्या अपने अस्तित्व को बचा सकता है, चाहे वहा जितना भी प्रयास करें उसके सभी प्रयास विफल होंगे एवं उसे कहां ले जा कर फेंक दे उसकी वो कल्पना भी नहीं कर सकता। वस यही उदाहरण को स्वयं पर निरूपित करें आप इस संसार मैं तिनका मात्र है और ये मायावी संसार उस तूफान की भांति है जिसकी डोर ईश्वर के हाथों में है, वस यही भावना व अनुभव जिस ओर हमें मोड़ता वह' प्रार्थना' है...

'प्रार्थना 'उस विराट से कि तेरा संरक्षण ही मुझे मलिन संस्कार को मिटाने में हमारी मदद करें... हे विराट, अनंत, अनादि हमें क्षमा कर, दया कर.. अपनी कृपा बरसा उन सभी दोषों के लिए क्षमा मांगता हूं जो मैंने पूर्व के अनेकों जन्मों में किए, उन दोषों के लिए क्षमा जो इस जन्म में हुए एवं ना चाहते हुए भी हर पल हर क्षण हो जाते हैं, दया कर कि इस शरीर व इस मन के प्रति प्रत्येक पल, क्षण सजग और शांत रहु , हे ईश्वर अपनी दया दृष्टि मुझ पर बना मेरे समस्त अहंकार को आंखों के पानी में डुबो दें, मात्र अपने निजी कार्यों से ही मैं स्वयं को प्रकट ना करू, तू अपनी इच्छा मेरे जीवन के माध्यम से पूरी करें...

यही प्रार्थना हमें ईश्वर के प्रति समर्पण कर अपनी आध्यात्मिक यात्रा में सभी बाधाओं को हटाकर उस विराट, अनंत, सर्वज्ञ तक पहुंचाने का मार्ग बनाती है.... आध्यात्म और प्रार्थना का योग ही मनुष्य को उस परम शाश्वत सत्य के करीब ले जाता है। 




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