अहंकार विभिन्न समस्याओं का कारण....
आज वर्तमान में जो भी समस्याएं हमें चारों ओर परिलक्षित होती दिखती हैं, वे कहीं ना कहीं अहंकार का ही परिणाम है। ये समस्याएं व्यक्तिगत स्तर से आरंभ हो वैश्विक स्तर तक मौजूद है... व्यक्तिगत स्तर पर अहंकार व्यक्ति के जीवन को समूल रूप से नष्ट कर देता है, पारिवारिक स्तर पर अहंकार के कारण परिवार विघटन, विवाह विच्छेद जैसे प्रकरण आजकल सामान्य है, सामाजिक स्तर पर भेदभाव की नीति, जातिवाद, महिलाओं को सामान्य अधिकार प्राप्त ना होना अहंकार का ही नतीजा है, राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र से अधिक स्वार्थ को महत्व देना.. राष्ट्र धर्म का पालन ना कर स्वार्थ सिद्धि के लिए कार्य करना भी अहंकार का ही रूप है, वैश्विक स्तर पर एक देश द्वारा अन्य देशों पर वर्चस्व कायम कर समूचे विश्व पर राज करने की नीति भी अहंकार ही को दर्शाता है अर्थात अहंकार का विशालकाय रूप व्यक्ति से लेकर समूचे विश्व को अपने घेरे में लिए हुए हैं...
अहंकार का इतना विस्तृत रूप लेने का कारण
अहंकार का इतना विस्तृत रूप लेने का मुख्य कारण है मनुष्य की अहंकार की प्रति सीमित समझ या ये कहे कि अहंकार क्या है इसकी वास्तविक समझ ना होना...
अहंकार क्या है
अहंकार एक प्रकार की पहचान और जुड़ाव है, जब हम इस देह के साथ पहचान स्थापित कर इससे जुड़कर अपना -पराया, मैं, मेरा-तेरा, तुम्हारा, राग -द्वेष में जकड़ जाते हैं तो यह 'अहंकार' है अर्थात जहां ज्ञान का अभाव है वहां अहंकार है।
जहां भी 'मैं का भाव' हैं वहां अहंकार है, इस प्रकार तो इस देह के साथ जन्मा प्रत्येक मनुष्य अहंकारी व अभिमानी है। ये सुनने मैं बहुत आश्चर्यजनक लगता हैं की हम सब अहंकारी.... 'नहीं मैं तो अहंकारी नहीं ' ये सोच की 'मैं अहंकारी नहीं' ये भी अहंकार को ही दर्शाती हैं क्यूंकि साथ में 'मैं' के साथ जुड़ाव व पहचान स्थापित हैं.. एवं ये 'मैं भाव' जितना प्रबल होगा वहा मनुष्य उतना ही अहंकारी होता चला जाता हैं।
जैसे कोई आपकी जब प्रशंसा करें तो हम फूले नहीं समाते और जैसे ही कोई व्यक्ति हमारी कमियां दिखाता है हमारा अहंकार उठ खड़ा होता है एवं हम तुरंत ही प्रतिक्रिया देते हैं, उदाहरण मैं ब्लॉग के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करती हूं यदि कोई व्यक्ति मेरे ब्लॉग की प्रशंसा करता है तो मेरा 'मैं भाव' अत्यंत प्रफुल्लित हो उठता है, और यदि कोई व्यक्ति इस ब्लॉग की निंदा करें तो मेरे 'मैं भाव' को ठेस पहुंचेगी ये दोनों ही अवस्थाएं अहंकार का रूप लिये हुई हैं अर्थात जहाँ 'मैं भाव' असंतुष्ट होता है तो अहंकार है और जहां भी संतुष्ट होता है तो भी अहंकार का ही रूप हैं।
बस फर्क इतना है कि संतुष्ट होने पर व्यक्ति को सुख प्राप्त होता और असंतुष्टि पर दुख। संतुष्ट होने पर संभवतः यह भावना मन तक ही सिमित रह जाती है शब्दों में कम ही प्रकट होती है परंतु 'मैं भाव 'के असंतुष्ट होने पर व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया करता है, इस प्रकार अहंकार हम सब में समाहित है बस अंतर इतना है कि जिस व्यक्ति में यह 'मैं भाव' जितना प्रबल होगा वह उतना ही अधिक अहंकारी होगा। इस 'मैं भाव' के अधिक प्रबल होने के कारण व्यक्ति में दूसरे प्रकार के दोष परिलक्षित होने लगते हैं और उन्हें ही हम अहंकार के विभिन्न रूपों के नाम से जानते हैं जैसे....
क्रोध :- क्रोध का तात्पर्य आप की अपेक्षा के अनुरूप सामने वाले व्यक्ति का व्यवहार नहीं करना या आपके समक्ष व्यक्ति जब आपकी इच्छा के विपरीत कार्य करें तो क्रोध उत्पन्न होता है, अर्थात आपका 'मैं 'खंडित होता है।
ज़िद /हठी :- मैं ऐसा क्यों करूं, यह मुझे ही चाहिए, यह मुझे नहीं चाहिए, मैं ऐसा नहीं करूंगा। इन वाक्यों से सरलता ही स्पष्ट हो रहा है कि 'मैं भाव' जड़ हो गया है अथवा अकड़ गया हैं, ये अहंकार ही हैं।
ईर्ष्या :-सामने वाले व्यक्ति के पास जो है वह मेरे पास ना होना ईर्ष्या के भाव को दर्शाता है। यहां 'मेरे पास नहीं' होना 'मैं भाव' का प्रबल सूचक है।
लोभ :- आवश्यकता पूर्ति के पश्चात भी लालसा का बढ़ता जाना और अधिक पाने की इच्छा लोभ है, लोभ केवल अर्थ तक ही सीमित नहीं है जहां कहीं भी अधिक पाने की चाह हो वहां लोभ है।
मोह :- किसी भी व्यक्ति या वस्तु के प्रति आवश्यकता से अधिक लगाव मोह का कारण बनता है।
भय :-मृत्यु का भय, कुछ खोने का भय, कुछ छूट जाने का भय, ये भय किसको होता है 'मुझसे 'कोई व्यक्ति या वस्तु दूर ना हो जाए।
आसक्ति :- शरीर के साथ जुड़कर किया गया कर्म आसक्ति का कारण बनता है क्योंकि अहंकार जुड़ाव के कारण उत्पन्न होता है इसलिए आसक्ति भी अहंकार का ही रूप है।
राग द्वेष :- राग और द्वेष अहंकार के ही परिणाम है, राग हमें पेहले प्रेम सा प्रतीत होता है परंतु जैसे ही राग खंडित होता है वहां बदले की भावना विकसित होती है जो द्वेष है।
अहंकार का आध्यात्मिक स्वरुप
अहंकार के वास्तविक स्वरुप को समझने व इसकी मूल जड़ तक पहुंचने हेतु इसे आध्यात्मिक परिपेक्ष में भी समझना अत्यंत आवश्यक है, हमारी चार अंतरचतुष्ट्य इंद्रिया -"मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार "में से एक 'अहंकार' है... इससे पूर्व के लेख में हमने मन के विषय में विस्तृत चर्चा की..
बुद्धि के साथ मिलकर आत्मा अहंकार है, हमारे पूज्य गुरुदेव महायोगी पायलट बाबा जी अहंकार को गहराई से समझाते हैं ताकि अहंकार को समझ कर इसे मिटा कर व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पा सके ,बाबाजी कहते हैं --
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अहंकार 'अस्मिता 'से जन्मा है, 'अस्मिता' मन से पूर्व की अवस्था है। अस्मिता आत्मबोध कि वह अवस्था है जहाँ से मन का उदय होता है, अस्मिता के भी दो रूप है_
• अभिमान :- अभिमान इस देह का, मे देह हूं, देह के साथ जुड़कर 'मैं भाव' में खोकर अपना पराया राग द्वेष में उलझ जाना अभिमान।
• स्वाभिमान :-जो स्वंम में स्थित हैं वह स्वाभिमानी हैं, उदहारण जब बेटा या बेटी आत्मनिर्भर होने हेतु आर्थिक रूप से प्रयास करते परिवार से पृथक हो तो ये अभिमान नहीं स्वाभिमान कहलाता है। एवं जब कोई व्यक्ति आत्म अनुभूति के लिए समाज से अलग होकर स्वयं की खोज में निकलता है तो यह अभिमान नहीं स्वाभिमान है।
अहंकार के विषय में पूर्णता असीमित ज्ञान ने ही इसे व्यक्ति से लेकर वैश्विक समस्या के रूप में निरूपित किया। अतः समस्या का समाधान तभी संभव है जब व्यक्ति इसे समझ कर स्वयं में परिवर्तन करते हुए छोटे-छोटे संकल्प लेकर अहंकार रूपी रावण पर विजय प्राप्त करे क्योंकि यकायक अहंकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। चूकि समस्या व्यक्ति से आरंभ हो वैश्विक पर पहुंची है अतः समाधान भी व्यक्ति से आरंभ हो वैश्विक तक ही पहुंचेगा।
बहुत अच्छा
ReplyDelete👌
DeleteBohot he acha likha hai. 👍🏼👌🏼
ReplyDeleteVery nice Annu
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