कर्म, प्रारब्ध, संस्कार व नियति...





 "प्रारब्ध और संस्कारों के अनुकूल भोग करता जीवन, नए संस्कारों की नींव डालता जाता है परंतु वह करता कुछ नहीं, सब कुछ एक महान शक्ति के गुरुत्वाकर्षण में होता रहता है। मनुष्य तो कर्मानुकूल संस्कारों द्वारा निर्मित एक खिलौना मात्र है। "

                                                                                                          (महायोगी पायलट बाबा ) 

                                                                                                     {श्रोत -हिमालय केह रहा भाग 1, पृष्ठ 50 }

इस से पूर्व के लेख में हमनें मनुष्य जीवन का महत्व व लक्ष्य को जानने का प्रयास किया, किन्तु मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना इतना सहज नहीं जितनी सहजता के साथ इसे व्यक्त, लिखा व समझा जा सकता हैं। मनुष्य अपने वास्तविक धेय को पहचान जब आगे को बढ़ता हैं तो उस दौरान उसे कई चुनौतियां व संघर्ष का सामना करना होता हैं क्यूंकि पीछे बहुत बड़े कर्मों की श्रृंखला रहती जिसे पार करने हेतु अत्यंत दृढ़ता के साथ आगे बढ़ना होता हैं एवं इस दौरान जो प्रश्न उसके समक्ष आ खड़े होते हैं....


* क्यों मनुष्य अपने ही कर्म बंधनो में इतना जकड़ा हुआ हैं ?
* क्यों वह बहुत कुछ चाहते हुए भी परिस्थितियों का दास बना रह जाता है..?
* क्या कारण होते हैं कि जो उसे बार-बार आगे के मार्ग में बढ़ने से रोकते हैं?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर हम पूज्य बाबा जी द्वारा लिखित पंक्तियों में पा सकते हैं। कितनी सुंदरता के साथ बाबाजी ने अनमोल विचारों को शब्दों की माला में पिरोया, इन पंक्तियों में जिन मुख्य शब्दों का प्रयोग हुआ, वे है प्रारब्ध, संस्कार व एक महाशक्ति के गुरुत्वाकर्षण। सर्वप्रथम हमें समझना होगा प्रारब्ध क्या है? संस्कार क्या है? और जब हम प्रारब्ध व संस्कार की बात करते हैं तो यह समझना अत्यंत अनिवार्य हो जाता है कि कर्म क्या है ?
पूज्य बाबाजी कहते हैं..

"कर्म ही संस्कार को बनाता है। कर्म ही प्रारब्ध का निर्माण करता है। कर्म ही संस्कार और प्रारब्ध दोनों का भोग करता है। कर्म की प्रवृत्ति प्रकृति का गुण है, मानव का धर्म है। "

कर्म क्या हैं...
जो भी क्रिया या कार्य मनुष्य द्वारा कि जाये वह 'कर्म 'की श्रेणी में आते है, चाहे वह क्रिया शारीरिक हो या मानसिक, एवं हमारे जैसे कर्म होंगे उनका फल भी आना अकाट्य है।
गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं...

                             न हि कश्चित्क्षमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
                           कार्यते ह्यवस: कर्म सर्व: प्राकृतिक जैव गुणै: || 5||

                                                                           (अध्याय 3, कर्म योग )
भावार्थ 
है अर्जुन कोई भी पुरुष किसी भी काल में क्षण मात्र भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता क्योंकि सभी को प्रकृति से उत्पन्न हुए गुण द्वारा विवश होकर कर्म करना होता है।
इस प्रकार मनुष्य सोना, जागना, विचार करना, आलस्य करना इत्यादि सभी कर्म की श्रेणी में आते हैं। कर्म फल प्राप्ति की दृष्टि से तीन प्रकार के होते हैं....

संचित कर्म :- इस जन्म से पूर्व हमारे अनेकों जन्मों के प्रति पल व झण में किए गए असंख्य कर्म होते हैं एवं उन सभी कर्मों का फल एक जीवन में भोगना संभव नहीं इसलिए इस श्रेणी वे सभी कर्म आते हैं जो मनुष्य द्वार पूर्व में किये गये एवं जिनका फल अभी संचित है एवं परिणाम आना शेष है।

प्रारब्ध कर्म :-हमारा वर्तमान जीवन प्रारब्ध कर्मों का ही परिणाम हैं अर्थात पूर्व जन्म में किये गये वे कर्म जिनका परिणाम वर्तमान में सुख-दुख के रूप में प्राप्त होता हैं, जिसे हम सामन्य भाषा में भाग्य या किस्मत के नाम से भी जानते हैं 'प्रारब्ध कर्म'  कहलाते हैं। संपूर्ण जीवन के सभी बड़ी घटनाओं का निर्धारण इन्हीं के द्वारा होता है, मनुष्य का जन्म कहाँ होना हैं, किस ओर गतिशील हो उसका जीवन आगे का रास्ता खोजेगा एवं किस प्रकार उसकी जीवन लीला समाप्त होगी यह सभी प्रारब्ध कर्मों का ही खेल हैं।

क्रियमाण कर्म :-ऐसे कर्म जिनका फल अतिशीघ्र प्राप्त हो क्रियमाण कर्म कहलाते हैं। उदाहरण हमें भूख लगी हमने भोजन ग्रहण किया और सुधा शांत हो जाती हैं। हमने किसी से गलत व्यवहार किया बदले में उसने भी हमे वैसा ही प्रतिउत्तर दिया, ये 'क्रियमाण कर्म' का फल हैं।

संस्कार :- जो भी कर्म हमारे द्वारा किए जाते हैं उनका फल प्राप्त होना भी अकाट्य है, कर्म फल भोगने के पश्चात उसकी छाप जो चित्त पर शेष रह जाती है उसे 'संस्कार' के नाम से जाना जाता है। साधारण भाषा में इन्हें हम आदतों के नाम से भी जानते हैं, व्यक्ति जैसे कर्म करेगा वैसे ही उसके संस्कारों का निर्माण होगा। उदाहरण:-

क्रोध का कर्म - क्रोध का संस्कार बनाएगा
भय का कर्म -भय का संस्कार बनाएगा एवं
दया, प्रेम, करुणा के कर्म -दया ,प्रेम और करुणा के संस्कार बनाएंगे।


पूज्य बाबा जी द्वार इन पंक्तियों में 'एक महान शक्ति के गुरुत्वाकर्षण 'शब्द का प्रयोग किया है, इन शब्दों के अर्थ को समझ ही हम इस लेख के मुख्य बिंदु पर पहुंच सकते हैं। महान शक्ति के आकर्षण  के विषय में जब मैंने बाबाजी से स्वयं पूछा कि यह महान शक्ति के गुरुत्वाकर्षण का वास्तविक अर्थ क्या हैं तो उन्होंने कहा बेटा यह कुछ और नहीं नियति है। नियति अर्थात जिसका होना अटल है अर्थात मनुष्य का जीवन एक परधि एक चक्र में गतिशील है एवं उस चक्र में उसकी गति का निर्धारण कर्म, प्रारब्ध, संस्कार करते हैं यह कर्म, प्रारब्ध, संस्कार ही मिलकर मनुष्य की 'नियति' का निर्माण करते हैं।

इस चक्र की गति को हम उदाहरण से बेहतर समझ सकते हैं -
इस हेतु अपने पिताश्री के जीवन का उदाहरण देना चाहूंगी, किस प्रकार मनुष्य के जीवन की दिशा इस परधि में रहते हुए आगे बढ़ती हैं।
मेरे पिताश्री का जीवन अनेकों अनुभव पर संघर्षों में बीता उनके जीवन को कुछ पंक्तियों में समेटना आसान नहीं परंतु फिर भी इस कर्म, संस्कार व प्रारब्ध को समझने हेतु उनका जीवन सटीक उदाहरण पेश करता हैं।

पिताश्री ने जीवन का आरंभिक काल शिक्षा क्षेत्र में कदम रखा आरंभ किया, किंतु उनके प्रारब्ध ने उन्हें शिक्षा क्षेत्र से निकाल उनके हृदय में वसे राष्ट्रभक्ति के संस्कारों ने उन्हें सामरिक क्षेत्र की ओर मोड़ा और उन्होंने जीवन का कुछ समय भारतीय थल सेना में रहकर  सेवा दी, परंतु नियति ने उनके संस्कारों के अनुकूल जीवन में अनेकों क्षेत्रों का अनुभव लेना लिखा था, इसलिए तो सामरिक से सामाजिक क्षेत्र में प्रवेश कर युवा अवस्था में 70 के दशक में जे पी आंदोलन से जुड़ते हुए एवं एक मीसावंदी के रूप में लगभग 19 माह जेल में रह लड़खड़ाते लोकतंत्र  को पुनः जींवत करने में अपना मह्त्वपूर्ण योगदान देकर राजनीति में प्रवेश किया, चूँकि उनके संस्कारों का ईश्वरी व आध्यात्मिक होने के कारण  वे राजनीति से अनुभव लेते हुए वर्तमान में अपने पूज्य गुरुदेव महायोगी पायलट बाबाजी के सानिध्य में आध्यात्मिक मार्ग का सहारा ले मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

अतः हमने देखा कि किस प्रकार मनुष्य के कर्म व संस्कार से बना प्रारब्ध मनुष्य को विभिन्न क्षेत्रों में अनुभव दिलाता हुआ मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य परमात्मा व पूर्णत्व को प्राप्त करने हेतु मार्ग बनाता है।

हमने लेख में देखा मनुष्य किस प्रकार संस्कारों व प्रारब्ध के चक्रव्यूह में रहते हुए नए कर्मों की नींव रखता है, परंतु नवीन कर्मों पर भी पुराने संस्कारों की छाप होना स्वाभाविक है क्योंकि यह एक चक्र है जिसे भेदना इतना सरल कार्य नहीं। तो क्या इस प्रकार मनुष्य अपनी ही परिस्थितियों का दास बन यूं ही जन्म मृत्यु और सुख-दुख के भोग में फंसा रहेगा, अतः हम कैसे कह सकते हैं मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं वहा पूर्णत्व को प्राप्त करने का परम अधिकारी है। हां ये पूर्णता सत्य की एकमात्र मनुष्यों ही सत्य, परमात्मा को प्राप्त कर सकता है परंतु यह भी सच है कि यह मनुष्य शरीर अनेकों जन्मों व जीवन का परिणाम हैं जिस पर उन अनेकों जीवन के प्रारब्ध कर्म व संस्कार का खोल सूक्ष्म रूप से चढ़ा हुआ है, जिसे हटाना अत्यंत दुष्कर है परंतु असंभव नहीं। इस परिधि व चक्र को जिस माध्यम से भेदा जा सकता है वह है 'साधना'। 




Comments


  1. अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन व प्रभावशाली लेखन।
    मानव जीवन की सबसे अबूझ पहेली कर्म एवं उसके पर्याय , इन दोनों ही को इस लेख के माध्यम से बड़ी ही बारीकी व सरलता से प्रस्तुत किया गया। मुझे विश्वास है ये पाठकों के लिए कर्म ,प्रारब्ध एवं कर्मफल जैसे जटिल आध्यात्मिक सूत्रों को समझने व आत्मसात करने में सफल रहेगा।

    कोटिशः शुभकामनाएं ।।।

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