साधना
साधना शब्द को सुनते ही जो शब्द हमारे मस्तिष्क में विचरण करने लगते हैं.. वे है योग, ध्यान, संत समाज , साधु, सन्यास, सन्यासी आदि । सामान्यतः लोग साधना का अर्थ इन्हीं शब्दों से जोड़कर देखते हैं|
साधना अर्थात 'साध कर' आगे बढ़ना, किसे साथ कर आगे बढ़ना अपने जीवन के लक्ष्य को साधने हेतु किए गए दृढ़,अनुशासित एवं संकल्पित प्रयास ही 'साधना' हैं। किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किए गए प्रयास 'साधना' है।
हमने अपने पूर्व के लेखों में मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य उसके मध्य आने वाली बाधाओं की चर्चा की थी।
साधना किस प्रकार मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य के समक्ष आड़े आने वाले कर्म बंधनों को हटाने में सहायक हैं, इसे जानने का प्रयास करेंगें। इन बाधाओं को समूल रूप से नष्ट करने का एक मात्र मार्ग आध्यात्मिक साधना है। अध्यात्मिक साधना के दौरान जिसे साधना हैं वह 'मन'हैं जिसने मन को साधा उसने जीवन के परम लक्ष्य को भी साध लिया समझो। मन के विषय में पूर्व के लेख "मन के आयाम" में विस्तृत रूप से जान सकते हैं। प्रारंभिक दौर में एक आध्यात्मिक साधक किस प्रकार अपने लक्ष्य को साध कर अध्यात्मिक उन्नति करे... इस हेतु निम्न प्रयास साधक को आपनी आरम्भिक साधना में शामिल करने होंगे.. ..
स्वाध्याय.. स्वाध्याय का अर्थ स्वयं का अध्ययन क्योंकि जब मनुष्य आध्यात्मिक मार्ग की ओर बढ़ता है तो उसे स्वयं का अध्ययन अर्थात आत्ममंथन करना अत्यंत अनिवार्य हो जाता है ताकि उसे ज्ञात हो सके उसके भीतर कौन-कौन से दुर्गुण व सत गुण है? क्या उसकी योग्यताएं और क्षमताएं हैं? क्योंकि सामान्यत: मनुष्य स्वयं के परिचय से अनभिज्ञ रहता है। स्वंय का अध्ययन ही मन को समझने व साधने में सहायता प्रदान करता है।चूकि आत्ममंथन इतना आसान नहीं इस हेतु आरंभ में स्वाध्याय के अंतर्गत -
* शास्त्रों का अध्ययन व प्रेरणादायक महापुरुषों का अध्ययन करना शामिल हैं।
* सत्संग जैसे क्रियाकलाप भी स्वाध्याय में सहायक है।
प्रार्थना.. स्वाध्याय के फल स्वरूप जब मनुष्य स्वयं के गुण व दोषों से परिचय पा लेता है तो उसे एकाग्र मन के साथ स्वयं को विकसित कर अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निरंतर ईश्वर से प्रार्थना रत रहना होगा।
परिणाम निरंतर प्रार्थना रत रहने से मन की एकाग्रता का विकास हो मन शांत होता है एवं मनुष्य व्यर्थ के विचारों से मुक्ति पाता है अंततोगत्वा मन निर्मल होने की ओर अग्रसर होता है।
उपवास.. उपवास अर्थात ईश्वर से समिपता एवं ईश्वर से समिपता तभी संभव है जब मनुष्य का मन पवित्र व शांत हो। उपवास साधना के तहत मन पर संयम रखने हेतु एक दिवस से लेकर कई दिवस तक (मनुष्य की क्षमता के अनुरूप )अन्न जल को त्यागा जाता है ताकि उस दौरान मन पर संयम रख भूख को नियंत्रित किया जा सके।
परिणाम उपवास के फल स्वरुप मनुष्य केवल अपनी सुधा पर नियंत्रण नहीं पाता है बल्कि मन को संयमित कर ईश्वर की अनुभूति का अनुभव करता है।
व्रत.. सामान्यता व्रत व उपवास को एक ही समझा जाता है जहां उपवास में मन को संयमित करने हेतु अन्न जल का त्याग किया जाता है वही व्रत में किसी भी प्रकार का त्याग निश्चित समय तक स्वयं पर लागु करना होता हैं। जैसे मौन व्रत, जैन सम्प्रदाय में संपूर्ण जीवन कोई भी एक खाद्य सामग्री का त्याग करना होता है, हिन्दुओं में पर्वों के दौरान नंगे पैरों का व्रत करना इत्यादि।
परिणाम व्रत मन को सयमित करने में अत्यंत सहायक क्योंकि इस दौरान हम पूर्ण सजग हो व्रत का पालन करते हैं, सजगता मनुष्य के मन को शांत व एकाग्र भी करती है एवं उसे उसके लक्ष्य की ओर केंद्रित करती हैं।
जाप.. मन को एकाग्र कर मन को शांत करने हेतु जाप अत्यंत फलदायी है। एक साधक को नियमित जाप अवश्य करना चाहिए है। यदि आप दीक्षित है तो प्रयास करें गुरु मंत्र का जाप अधिक से अधिक हो सके और यदि दीक्षित नहीं है तो ''ॐ ''व प्रणव मंत्र ''ॐ नमः शिवाय'' सर्वाधिक उपयुक्त हैं।
परिणाम निरंतर जाप के अभ्यास से मनुष्य का मन मंत्र व ध्वनि में रम जाता है। इस प्रकार अन्य सभी विचार स्वतः ही समाप्त होने लग जाते हैं एवं शने: शने : मन उस अवस्था में जा पहुंचता है जिसे हम 'अजपा' कहते हैं।
प्राणायाम.. श्वास का सीधा संबंध मन के साथ होता है जब हम व्यायाम, सूर्य नमस्कार या दौड़ को जाते हैं तो उस समय हमारी सांसों की गति सामान्य तौर पर बढ़ जाती है, इस दौरान श्वास की गति बढ़ने पर विचारों की गति धीमी हो जाती है उसी प्रकार ध्यान व प्राणायाम करने के दौरान सांसों की गति सामान्य रूप से धीमी हो जाती है और विचार भी मंद पड़ जाते हैं। इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास कर मन को संयमित व व्यवस्थित किया जा सकता है।
संकल्प शक्ति.. संकल्प का तात्पर्य है अपनी आध्यात्मिक इच्छा को प्राप्त करने के लिए किये गये प्रयास जो विश्वास व दृढ़ता से परिपूर्ण हो 'संकल्प 'कहलाते हैं, क्योंकि जब मनुष्य साधना के दौरान अपने अनेक जन्मों के दूषित संस्कारों को शुद्ध करने का प्रयास करता हैं
तो उस दौरान दृढ़ संकल्पित इच्छाशक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इन संस्कारों पर जमा अनेकों जन्मों की धूल को मात्र संकल्प शक्ति के द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है।
ध्यान... ध्यान का अर्थ अत्यंत व्यापक और प्रत्येक साधक के लिए प्रतिपल व झण में सजगता ही ध्यान का प्रारूप है। जब हम ऊपर उल्लेखित बिन्दुओ को अपनी दिनचर्या में व्यवस्थित व नियमित अभ्यास करते हैं तो मन शांत, सजग और एकाग्र होता है, एवं मन की यही अवस्था ध्यान की तैयारी है। स्थिर शरीर व मन ही ध्यानस्त अवस्था हैं।
इन प्रयासों के अतिरिक्त साधक को साधना के दौरान कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है....
* अनुशासन के साथ नियमित अभ्यास
* नियमित दिनचर्या
* मध्य मध्य में अपनी प्रगति का मूल्यांकन करना
* संयमित भोजन व सात्विक भोजन को ग्रहण करना
* साधना के अनुरूप संगति का होना
ऊपर वर्णित बिंदु आध्यात्मिक साधना के सोपान क्रम में प्रारंभिक प्रयास है, अभ्यास करते करते आध्यात्मिक साधना तो इन बिंदुओं से अत्यंत व्यापक व गहरी होती चली जाती है, परंतु एक प्रारंभिक अध्यात्मिक साधक इन बताए गए प्रयास को नियमित व अनुशासन के साथ करता है तो उसके दुर्गुण परिवर्तित हो निर्मल व शुद्ध होने लगते हैं जिसके परिणाम स्वरूप साधक को स्वत: ही ईश्वर की शक्ति का अनुभव प्राप्त होता है, एवं उस के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का सामना करने हेतु उसके पास साहस बल व आत्मविश्वास जैसी शक्तियों को मनुष्य स्वतः ही अनुभव करता है इस प्रकार साधना को सीढ़ी बना मनुष्य अपने दोषपूर्ण कर्मों को पार करता हुआ परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अग्रसर होता है।
हमने अपने पूर्व के लेखों में मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य उसके मध्य आने वाली बाधाओं की चर्चा की थी।
साधना किस प्रकार मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य के समक्ष आड़े आने वाले कर्म बंधनों को हटाने में सहायक हैं, इसे जानने का प्रयास करेंगें। इन बाधाओं को समूल रूप से नष्ट करने का एक मात्र मार्ग आध्यात्मिक साधना है। अध्यात्मिक साधना के दौरान जिसे साधना हैं वह 'मन'हैं जिसने मन को साधा उसने जीवन के परम लक्ष्य को भी साध लिया समझो। मन के विषय में पूर्व के लेख "मन के आयाम" में विस्तृत रूप से जान सकते हैं। प्रारंभिक दौर में एक आध्यात्मिक साधक किस प्रकार अपने लक्ष्य को साध कर अध्यात्मिक उन्नति करे... इस हेतु निम्न प्रयास साधक को आपनी आरम्भिक साधना में शामिल करने होंगे.. ..
स्वाध्याय.. स्वाध्याय का अर्थ स्वयं का अध्ययन क्योंकि जब मनुष्य आध्यात्मिक मार्ग की ओर बढ़ता है तो उसे स्वयं का अध्ययन अर्थात आत्ममंथन करना अत्यंत अनिवार्य हो जाता है ताकि उसे ज्ञात हो सके उसके भीतर कौन-कौन से दुर्गुण व सत गुण है? क्या उसकी योग्यताएं और क्षमताएं हैं? क्योंकि सामान्यत: मनुष्य स्वयं के परिचय से अनभिज्ञ रहता है। स्वंय का अध्ययन ही मन को समझने व साधने में सहायता प्रदान करता है।चूकि आत्ममंथन इतना आसान नहीं इस हेतु आरंभ में स्वाध्याय के अंतर्गत -
* शास्त्रों का अध्ययन व प्रेरणादायक महापुरुषों का अध्ययन करना शामिल हैं।
* सत्संग जैसे क्रियाकलाप भी स्वाध्याय में सहायक है।
प्रार्थना.. स्वाध्याय के फल स्वरूप जब मनुष्य स्वयं के गुण व दोषों से परिचय पा लेता है तो उसे एकाग्र मन के साथ स्वयं को विकसित कर अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निरंतर ईश्वर से प्रार्थना रत रहना होगा।
परिणाम निरंतर प्रार्थना रत रहने से मन की एकाग्रता का विकास हो मन शांत होता है एवं मनुष्य व्यर्थ के विचारों से मुक्ति पाता है अंततोगत्वा मन निर्मल होने की ओर अग्रसर होता है।
उपवास.. उपवास अर्थात ईश्वर से समिपता एवं ईश्वर से समिपता तभी संभव है जब मनुष्य का मन पवित्र व शांत हो। उपवास साधना के तहत मन पर संयम रखने हेतु एक दिवस से लेकर कई दिवस तक (मनुष्य की क्षमता के अनुरूप )अन्न जल को त्यागा जाता है ताकि उस दौरान मन पर संयम रख भूख को नियंत्रित किया जा सके।
परिणाम उपवास के फल स्वरुप मनुष्य केवल अपनी सुधा पर नियंत्रण नहीं पाता है बल्कि मन को संयमित कर ईश्वर की अनुभूति का अनुभव करता है।
व्रत.. सामान्यता व्रत व उपवास को एक ही समझा जाता है जहां उपवास में मन को संयमित करने हेतु अन्न जल का त्याग किया जाता है वही व्रत में किसी भी प्रकार का त्याग निश्चित समय तक स्वयं पर लागु करना होता हैं। जैसे मौन व्रत, जैन सम्प्रदाय में संपूर्ण जीवन कोई भी एक खाद्य सामग्री का त्याग करना होता है, हिन्दुओं में पर्वों के दौरान नंगे पैरों का व्रत करना इत्यादि।
परिणाम व्रत मन को सयमित करने में अत्यंत सहायक क्योंकि इस दौरान हम पूर्ण सजग हो व्रत का पालन करते हैं, सजगता मनुष्य के मन को शांत व एकाग्र भी करती है एवं उसे उसके लक्ष्य की ओर केंद्रित करती हैं।
जाप.. मन को एकाग्र कर मन को शांत करने हेतु जाप अत्यंत फलदायी है। एक साधक को नियमित जाप अवश्य करना चाहिए है। यदि आप दीक्षित है तो प्रयास करें गुरु मंत्र का जाप अधिक से अधिक हो सके और यदि दीक्षित नहीं है तो ''ॐ ''व प्रणव मंत्र ''ॐ नमः शिवाय'' सर्वाधिक उपयुक्त हैं।
परिणाम निरंतर जाप के अभ्यास से मनुष्य का मन मंत्र व ध्वनि में रम जाता है। इस प्रकार अन्य सभी विचार स्वतः ही समाप्त होने लग जाते हैं एवं शने: शने : मन उस अवस्था में जा पहुंचता है जिसे हम 'अजपा' कहते हैं।
प्राणायाम.. श्वास का सीधा संबंध मन के साथ होता है जब हम व्यायाम, सूर्य नमस्कार या दौड़ को जाते हैं तो उस समय हमारी सांसों की गति सामान्य तौर पर बढ़ जाती है, इस दौरान श्वास की गति बढ़ने पर विचारों की गति धीमी हो जाती है उसी प्रकार ध्यान व प्राणायाम करने के दौरान सांसों की गति सामान्य रूप से धीमी हो जाती है और विचार भी मंद पड़ जाते हैं। इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास कर मन को संयमित व व्यवस्थित किया जा सकता है।
संकल्प शक्ति.. संकल्प का तात्पर्य है अपनी आध्यात्मिक इच्छा को प्राप्त करने के लिए किये गये प्रयास जो विश्वास व दृढ़ता से परिपूर्ण हो 'संकल्प 'कहलाते हैं, क्योंकि जब मनुष्य साधना के दौरान अपने अनेक जन्मों के दूषित संस्कारों को शुद्ध करने का प्रयास करता हैं
तो उस दौरान दृढ़ संकल्पित इच्छाशक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इन संस्कारों पर जमा अनेकों जन्मों की धूल को मात्र संकल्प शक्ति के द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है।
ध्यान... ध्यान का अर्थ अत्यंत व्यापक और प्रत्येक साधक के लिए प्रतिपल व झण में सजगता ही ध्यान का प्रारूप है। जब हम ऊपर उल्लेखित बिन्दुओ को अपनी दिनचर्या में व्यवस्थित व नियमित अभ्यास करते हैं तो मन शांत, सजग और एकाग्र होता है, एवं मन की यही अवस्था ध्यान की तैयारी है। स्थिर शरीर व मन ही ध्यानस्त अवस्था हैं।
इन प्रयासों के अतिरिक्त साधक को साधना के दौरान कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है....
* अनुशासन के साथ नियमित अभ्यास
* नियमित दिनचर्या
* मध्य मध्य में अपनी प्रगति का मूल्यांकन करना
* संयमित भोजन व सात्विक भोजन को ग्रहण करना
* साधना के अनुरूप संगति का होना
ऊपर वर्णित बिंदु आध्यात्मिक साधना के सोपान क्रम में प्रारंभिक प्रयास है, अभ्यास करते करते आध्यात्मिक साधना तो इन बिंदुओं से अत्यंत व्यापक व गहरी होती चली जाती है, परंतु एक प्रारंभिक अध्यात्मिक साधक इन बताए गए प्रयास को नियमित व अनुशासन के साथ करता है तो उसके दुर्गुण परिवर्तित हो निर्मल व शुद्ध होने लगते हैं जिसके परिणाम स्वरूप साधक को स्वत: ही ईश्वर की शक्ति का अनुभव प्राप्त होता है, एवं उस के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का सामना करने हेतु उसके पास साहस बल व आत्मविश्वास जैसी शक्तियों को मनुष्य स्वतः ही अनुभव करता है इस प्रकार साधना को सीढ़ी बना मनुष्य अपने दोषपूर्ण कर्मों को पार करता हुआ परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अग्रसर होता है।

Very nice Annu👍👍👍
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