आध्यात्मिक जीवन

आध्यात्म एक अलग ही शैली है संसार को समझ कर संसार से विलग होने का मार्ग , जीवन जीने की एक ऐसी शैली जो स्वयं में परिपूर्ण हैं, जो स्वयं के अस्त्वि को निखारते हुए हमें हमारे वास्तविक अस्तित्व का बोध कराने में सहायक हैं... आखिर कार
 
आध्यात्म क्या हैं...??

कैसे आध्यात्म की ओर बढ़े..?

आध्यात्म में आने वाली बाधाएं क्या हैं..? 

आध्यात्मिक जीवन में संघर्ष क्यों..? 

आध्यात्म क्या हैं...
आज मनुष्य अत्यंत व्याकुल हैं, उसकी व्याकुलता का क्या कारण हैं उसे ज्ञात भी नहीं, बस इस मायावी संसार की माया में उलझा हुआ हैं और अपने कर्मों से और उलझता जा रहा हैं। इस कर्म प्रधान संसार में क्या उसका व्यवहार हो..? किस प्रकार वह इस संसार को समझें..? क्या उसके कर्म व संस्कारों की गति हो..?  संसार क्या हैं..?  माया क्या है..?  कर्म क्या हैं? वास्तविकता क्या हैं जो इस हाण मांस के शरीर से बनी दो नेत्र इन्द्रियों से दिखलाई पड़ता हैं या फिर इन सबसे भी परे बहुत कुछ हैं जो हमारी क्षमता से बहुत दूर हैं।

कौन हैं जो उससे कर्म करता हैं..?  कर्म का कारण क्या हैं..?  विचार क्या हैं..? कौन विचार करता हैं? विचार कहाँ से आते हैं, ज्ञान क्या हैं मात्र वहीं जो हम इन्द्रियों द्वारा ग्रहण करते हैं या उससे भी परे एक पृथक आंतरिक ज्ञान का सागर हमारे भीतर हैं जो ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलता हैं, क्या हैं जो अदृश्य होते हुए भी अपने होने की अनुभूति करता हैं, क्या वास्तव में कोई ईश्वरीय सत्ता हैं..?

जब मनुष्य के भीतर इस प्रकार के प्रश्न हिचकोले खाने लगते हैं एवं मनुष्य जब इन प्रश्नों की खोज के लिए व्याकुल रहता हैं तो उसकी यहीं उत्कंठा उसे जिस मार्ग की ले जाती हैं वह 'आध्यात्म' हैं। 

आध्यात्म क्या हैं वहीं जो हमें ऊपर वर्णित प्रश्नों के उत्तर दे, हमें स्वयं से मिलाये, वही जो दृष्टिगोचर हो रहा हैं उससे परे जाने की यात्रा, आध्यात्म हमें इस जगत के कारण और परिणाम दोनों से अवगत करा कर बाहर से भीतर की ओर की यात्रा हैं।

क्या हैं आध्यात्मिक मार्ग.. 


मनुष्य के जीवन का लक्ष्य मात्र इस मायावी संसार में उलझें रेहना नहीं हैं बल्कि इस मायावी संसार की माया को भेद कर इसके परे जाने के लिए हुआ हैं मनुष्य जीवन का लक्ष्य जब व्यक्ति इस जगतरूपी मायावी संसार से वह सब कुछ प्राप्त करना चाहता हैं जो उसे शांति, आनंद व सुख दे , परंतु जब वह समझने लगता हैं की जिस आनंद, सुख व शांति को वो पाना चाहता हैं वह तो इस भौतिक संसार में क्षणभंगुर है, अतः उसकी भीतरी आत्मा जिस शांति, सुख और आनंद की मांग करती है उसे खोजने हेतु जिस मार्ग की ओर बढ़ता हैं वह 'आध्यात्मिक मार्ग' हैं।

आध्यात्मिक मार्ग की ओर कैसे बढ़े...


आध्यात्मिक मार्ग की ओर मनुष्य का जीवन स्वतः ही चल पड़ता हैं जब उसके पूर्व जन्मों के संस्करों के कारण उस के भीतर उठती उत्कंठा उसे इन प्रश्नों की खोज हेतु स्वतः ही इस ओर मोड़ देती हैं।
फिर भी कुछ बिंदु जो आध्यात्मिक मार्ग में बढ़ने में सहायता करते हैं..

* स्वयं के भीतर उत्पन्न हो रहे अनसुलझे व रहस्यमयी प्रश्नों के उत्तर हेतु स्वयं का आत्मअवलोकन करना होगा, स्वयं का पहचाना होगा मैं कौन हूँ..? क्या में मात्र शरीर हूँ, मेरे भीतर कौनसी ऊर्जा काम कर रही हैं, स्वयं के अवलोकन द्वारा स्वयं की क्षमता को जानना होगा, स्वयं के दोष और गुणों से अवगत होना होगा।

* स्वयं का अवलोकन उसे आगे बढ़ने की ओर मार्ग बनता हैं, इसके पश्चात उसे अपने भीतर विराजमान 'इक्षा शक्ति' व 'संकल्प शक्ति' को जानना होगा, इक्षा शक्ति उसे मार्ग में बढ़ने पर सहायता करती हैं तो संकल्प शक्ति मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाएगी।

* स्वयं का अवलोकन व इक्षा शक्ति ही मनुष्य को जिस ओर ले जाती हैं वह 'योग' हैं, योग के पथ पर चलते हुए मनुष्य अनेकों रहस्यमयी प्रश्नों के न सिर्फ उत्तर पाता हैं बल्कि उस सत्ता के करीब भी पहुँचता हैं जो अदृश्य है, विराट है, अनंत है, सर्वव्यापी है। मनुष्य अपने व्यवहार व रूचि के अनुरूप ही विभिन्न योग मार्ग में से किसी एक योग के मार्ग को चुन उसमें अग्रशील होता हैं। प्रमुख योग मार्ग हैं -कर्म योग, ज्ञान योग, राज योग, भक्ति योग।
 
* कर्म योग.. कर्म को प्रधान बना कर्ता भाव के आभाव में ईश्वर को समर्पित कर्म ही 'कर्म योग' हैं। जो मनुष्य को उस विराट से अवगत कराने का एक मार्ग हैं।
 
* राज योग.. मन को जान कर मन को साध कर आगे बढ़ने की यात्रा राज योग हैं मन व उसके आयाम , इसके तहत मनुष्य स्वयं के मन को भीतर की ओर मोड़ कर मन को उस अंनत में लीन करने की यात्रा हैं।
 
* भक्ति योग.. उस अदृश्य को समर्पित हो जीवन जीने की यात्रा 'भक्ति योग' हैं।
 
* ज्ञान योग.. ज्ञान अर्थात बोध होना किस का "जगत मिथ्या ब्रह्म सत्य" अर्थात ज्ञान को आधार बना परम सत्य तक पहुंचने का मार्ग।

आध्यात्म में आने वाली बाधाएं...

जब मनुष्य की यात्रा आध्यात्म की ओर बढ़ चलती हैं तो उसकी राह काँटों से भरी होती हैं संघर्ष से परिपूर्ण उसका जीवन जब आगे बढ़ता हैं तो राह राह पर चुनौतियां और विपरीत परिस्थितिया उसके सामने खड़ी होती हैं, यहां जो सबसे बड़ा प्रश्न उठता हैं की जब व्यक्ति आध्यात्म के मार्ग पर बढ़ते हुए सत्य की ओर गतिशील होता हैं तो उसका जीवन चुनौतियों से परिपूर्ण व इतना संघर्षशील क्यों होता हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे समक्ष है, यह हमारे आसपास ही मौजूद होते हैं कि जो लोग भी इस आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं उनका जीवन संघर्षों में व्यतीत होता है और उनके अंतिम दिन भी अत्यंत कष्ट शील रहते हैं, सांसारिक रूप में लिप्त व्यक्तियों के तो यह भी प्रश्न रहते हैं कितना धर्मनिष्ठ व्यक्ति था सत्य के मार्ग पर चला सेवा करता रहा फिर भी इतना कष्ट में जीवन बीता..
क्या कारण होते हैं इसके पीछे इसे भी हमें आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है, इन कारणों को भी वही व्यक्ति समझ सकता है जो वास्तविक में आध्यात्मिक मार्ग पर चल पढ़ा हो, ये प्रश्न भी आध्यात्मिक जीवन का एक बड़ा प्रश्न है..

संघर्ष के कारण...

इन सभी प्रश्नों को समझने हेतु हमें हिंदू धर्म कहें या सनातन धर्म में वर्णित पूर्व जन्मों के सिद्धांतों को समझना होगा, जिस जन्म में हम वर्तमान में है वह हमारे पूर्व जन्मों का परिणाम है एवं जो हम आज करेंगे उससे हमारे इस जीवन से आगे की यात्रा सुगम होगी, ये जन्मों का खेल हमारे द्वारा किए गए कर्मों पर निर्भर करता है कर्मों की गति संस्कारों पर निर्भर है, एवं कर्म और संस्कारों का जोड़ 'प्रारब्ध' है।  कर्म, प्रारब्ध, संस्कार मिलकर जिस चक्रव्यू का निर्माण करते हैं वह 'नियति'(कर्म , प्रारब्ध, संस्कार व नियति  )इसलिए नियति के चक्र में जीव अनेक योनियों में भटकता हुआ जन्म मृत्यु के जाल में फंसा रहता है अर्थात एक आत्मा विभिन्न जीव आत्माओं के रूप में असंख्य योनियों में जन्म मृत्यु से निकलती हुई मनुष्य योनि को प्राप्त होती है। 

क्योंकि मात्र मनुष्ययोनि ही कर्म प्रधान है परंतु अन्य योनियों के संस्कार भी जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर में संग्रहित होते हैं जो कि आगामी कर्मों का कारण बनते हैं, मनुष्य रूप में भी हमार कई जन्म और प्रत्येक जन्म में जाने अनजाने हमें ज्ञात भी नहीं असख्यं कर्मों का लेखा जोखा शेष रहता हैं जिनके कर्म एक जन्म में पूर्ण नहीं किये जा सकते परंतु जब मनुष्य सत्य के मार्ग को जानने हेतु आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़ता है तो उस चक्रव्यूह को भेदने का प्रयास करता है तो उसके असख्यं जन्मों के कर्म इसी जन्म में तेजी से कटना आरंभ होते हैं यहीं तेजी से कटते कर्म मनुष्य के समक्ष चुनौतियां, संघर्ष और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों के रूप में आते हैं, ये परिस्थितियां व संघर्ष मनुष्य जीवन में यातनाओं से कम नहीं।

परंतु जब मनुष्य इस मार्ग पर चल पड़ता है तो उसमें विवेक और समझ विकसित होती है, अपनी इसी विवेक और समक्ष को माध्यम बना वह सभी चुनौतियों, संघर्ष व विपरीत से विपरीत परिस्थितियों को मात्र दृष्टा और साक्षी के रूप में देखता हुआ अपने विभिन्न जन्मों के दोषों को कहीं हद तक इस जन्म में ही काट कर उस अदृश्य और विराट के समीप पहुंचने का मार्ग सुगम कर पाता है।


Comments

Popular posts from this blog

मन व उसके आयाम...

अष्टांग योग साधना (धारणा, ध्यान, समाधि )

शिक्षा