ऊर्जा की गति का आध्यात्मिक स्वरूप...
समस्त ब्रह्मांड व सृष्टि एक ऊर्जा के अंतर्गत गतिशील हैं, प्रत्येक गति व क्रिया के पीछे ऊर्जा ही काम कर रही हैं। किसी भी वस्तु की क्रियाशील होने की क्षमता उसकी ऊर्जा पर ही निर्भर करती हैं। यदि विज्ञान की परिभाषा को देखें तो भी उर्जा निरंतर गतिशील है.. " ऊर्जा का क्षय नहीं होता वह तो एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती हैं । यहीं ऊर्जा की परिभाषा भी है और नियम भी।"
जिस प्रकार ऊर्जा सर्वत्र गतिमान है उसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी ऊर्जा गतिशील है, ऊर्जा के कारण मनुष्य कर्म करता है, कर्म ही संस्कार बनाता है, संस्कार से प्रारब्ध व नियति का निर्माण होता है। इस तरह
मनुष्य शरीर में 'मन की जो गति है ' वही ऊर्जा का रूप है। मन निरंतर सोच, विचार, कल्पनाओं, भावनाओं आवेग के साथ गतिशील है। यह गहन विचार का विषय है कि हमारे भीतर जो मन की गति के रूप में उर्जा निरंतर गतिशील है | वह कैसी है ? हम क्या सोचते हैं.? कैसे विचार हमारे मन में आते हैं.? कैसी भावनाओं में हम उलझें है.? यही हमारे भीतर सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के संचार का कारण हैं। यही उर्जा बाहरी रूप में हमारे शब्द, बोलचाल, हमारे आचरण, व्यवहार का भी निर्धारण करती हैं।
यदि हमारा मन सदैव भय में हैं तो यह नकारात्मक ऊर्जा का परिचायक हैं, भविष्य के लिए अत्यंत चिंतित भी होना नकारात्मकता का ही बोधक हैं या फिर अपने अतीत की गिलानी भी नकारात्मक ऊर्जा का ही स्वरूप हैं इसके अतिरिक्त क्रोध, ईर्ष्या, घृणा भी नकारात्मक ऊर्जा के पोषक हैं।
जिस प्रकार ऊर्जा सर्वत्र गतिमान है उसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी ऊर्जा गतिशील है, ऊर्जा के कारण मनुष्य कर्म करता है, कर्म ही संस्कार बनाता है, संस्कार से प्रारब्ध व नियति का निर्माण होता है। इस तरह
मनुष्य योनि की अनंत क्षमताओं के पीछे भी ऊर्जा ही क्रियाशील है, किस प्रकार यह ऊर्जा मनुष्य शरीर में कार्य करती हैं ? एवं इस ऊर्जा को समझ किस प्रकार इसे सही दिशा दी जाए ? यहीं मनुष्य जीवन का परम कर्तव्य हैं।
मनुष्य शरीर में 'मन की जो गति है ' वही ऊर्जा का रूप है। मन निरंतर सोच, विचार, कल्पनाओं, भावनाओं आवेग के साथ गतिशील है। यह गहन विचार का विषय है कि हमारे भीतर जो मन की गति के रूप में उर्जा निरंतर गतिशील है | वह कैसी है ? हम क्या सोचते हैं.? कैसे विचार हमारे मन में आते हैं.? कैसी भावनाओं में हम उलझें है.? यही हमारे भीतर सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के संचार का कारण हैं। यही उर्जा बाहरी रूप में हमारे शब्द, बोलचाल, हमारे आचरण, व्यवहार का भी निर्धारण करती हैं।
यदि हमारा मन सदैव भय में हैं तो यह नकारात्मक ऊर्जा का परिचायक हैं, भविष्य के लिए अत्यंत चिंतित भी होना नकारात्मकता का ही बोधक हैं या फिर अपने अतीत की गिलानी भी नकारात्मक ऊर्जा का ही स्वरूप हैं इसके अतिरिक्त क्रोध, ईर्ष्या, घृणा भी नकारात्मक ऊर्जा के पोषक हैं।
वहीं दूसरी ओर प्रेम, दया, करुणा, क्षमा ऐसी भावनाएं जो मन की ऊर्जा को सकारात्मक कर हमारे बाहारी आचरण के साथ-साथ हमारे आसपास के वातावरण को भी शुद्ध सकारात्मक करने में सहायक हैं ।
इसलिए मन की इस ऊर्जा को सही दिशा देने हेतु विभिन्न उपाय शास्त्रों व ऋषि मुनियों द्वारा बताए गए हैं। मन वहीं सोचता विचारता हैं जो हमारी इंद्रियां ग्रहण करती हैं एवं इंद्रियों को सही दिशा में ले जाने हेतु स्वयं की जीवन शैली में परिवर्तन लाना होगा शास्त्रों के अनुसार स्वाध्याय, शास्त्रों का अध्ययन व मनन, मंत्र जाप, प्रार्थना, प्राणायाम व योग के अनुरूप जीवन शैली हमारे अंतः करण में बह रही ऊर्जा को शुद्ध व सकारात्मक कर संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ-साथ मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में सहायक हैं।
इसलिए मन की इस ऊर्जा को सही दिशा देने हेतु विभिन्न उपाय शास्त्रों व ऋषि मुनियों द्वारा बताए गए हैं। मन वहीं सोचता विचारता हैं जो हमारी इंद्रियां ग्रहण करती हैं एवं इंद्रियों को सही दिशा में ले जाने हेतु स्वयं की जीवन शैली में परिवर्तन लाना होगा शास्त्रों के अनुसार स्वाध्याय, शास्त्रों का अध्ययन व मनन, मंत्र जाप, प्रार्थना, प्राणायाम व योग के अनुरूप जीवन शैली हमारे अंतः करण में बह रही ऊर्जा को शुद्ध व सकारात्मक कर संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ-साथ मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में सहायक हैं।

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