गंगा

गंगा मात्र एक नदी नहीं भावनाओं, आस्था, श्रद्धा और विश्वास का समागम हैं। हज़ारों की संख्या में विभिन्न पर्व पर लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रार्थना करते हैं, अपनी भवानाओं की ऊर्जा को इसी गंगा में प्रवाहित करते हैं। इसी भावना, श्रद्धा और आस्था की ऊर्जा का परिणाम यह वृहद गंगा हैं।

गंगा के जीवन पर दृष्टि पात करें तो यह मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने का सबसे बढ़ा उदाहरण पेश करती हैं। गंगा क्या हैं..? कहाँ से प्रारम्भ हो, इसका जीवन जाता, यही सीखने योग्य हैं।

भारत के उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल हिमालय में गंगोत्री हिमानी से 'गौमुख' नामक स्थान से माँ गंगा का उदगम होता हैं। गौमुख से एक छोटी जलधारा के रूप में निकल आगे बढ़ते हुए अनेक छोटी छोटी धाराओं को स्वयं में समेटत हुए अत्यधिक वेग के साथ, अपने मार्ग के मध्य आने वाले पहाड़ो और पत्थरों को चिरती हुई, हरिद्वार के मैदानी भाग में प्रवेश करती हैं।

वस ऐसा ही मनुष्य जीवन हैं, गंगा की भाति माँ के गर्भ से जन्म लेने वाला यह छोटा सा शिशु उस जल धारा के सामान्य ही जो हिमालय से निकलती हैं। जिस प्रकार गंगा अनेक धाराओं और नदियों को स्वयं में समेटे आगे बढ़ती हैं, उसी प्रकार मनुष्य जीवन भी विभिन्न कर्म, संस्करों और गुणों को संजोये, जीवन यात्रा में जवानी के पड़ाव में प्रवेश करता हैं।

मनुष्य जीवन के जवानी के काल में उतना ही सामर्थ्य हैं जितना गंगा के वेग में, अंतर वस इतना हैं की गंगा इस शक्ति का प्रयोग अपने मार्ग में आने वाले अवरोध को हटाने में करती है तो वहीं मनुष्य इस शक्ति व ऊर्जा को व्यर्थ ही जाने देता हैं। यदि मनुष्य अपनी इस ऊर्जा का उपयोग विवेकशील हो जीवन की सार्थकता में करें तो बढ़ी से बढ़ी चुनौतियों को वह उसी प्रकार चीर दें जिस प्रकार माँ गंगा अपने वेग से अपने अवरोधओं को निकल फेकती हैं।

माँ गंगा के हरिद्वार में प्रवेश करते ही उसके संघर्ष की गाथा आरंभ हो जाती हैं। इन संघर्ष से भरी यात्रा से होते हुए ही ,  इसे अपने गंतव्य सागर तक पहुंचना होता हैं। हिमालय की ऊर्जा और जड़ी बूटीयां को अपने आँचल में समाहित किये गंगा हरिद्वार पहुंचते ही अति सौम्य और शांत होने लगती हैं। यहीं से मनुष्य जीवन कि मलिनता, पाप को लेते हुए अत्यंत शांत और सहनशीलता के साथ स्वयं को विस्तारित करते हुए बरेली, कानपुर, प्रयागराज, वनारस, पटना, कलकत्ता से होते हुए बंगाल की खाड़ी में जा अपने परम धेय्य सागर में विलीन हो जाती हैं।

इस 2525 किलोमीटर लम्बी यात्रा में निरंतर बहती हुई और बिना थमें बस देते हुए माँ गंगा को पाया। जिस राह से गुजरी मनुष्य के पापों को स्वीकार किया उन्हें धोया, जहाँ से गुजरी वहां की भूमि को उपजाऊ बना लोगों को सर्व सम्पन्न बनाया।

इतिहास साक्षी है सदियों से गंगा की  भूमि सभ्यताओं , वैवभता और संपनता का प्रतीक रहीं। इसी की तटीय भूमि से भारत को महान संत, महाराज और साम्राज्य प्राप्त हुए। वैदिक कालीन आर्य इसी के तट पर फले फुले। अखंड भारत की स्थापना करने वाला मौर्य साम्राज्य इसी भूमि कि देन हैं।
अशोक महान, चन्द्रगुप्त मौर्य, महात्मा बुद्ध, महावीर जैन इसी माँ गंगा की गर्भ की संताने हैं। जो इतिहास में अमर हो गए।
सदियों से बस इसी प्रकार देती आ रहीं गंगा की यात्रा सागर में विलीन हो पूर्ण हो जाती हैं।  जिस प्रकार गंगा का जीवन हैं, उसी प्रकार मनुष्य का भी , अंतर मात्र इतना है की मनुष्य इस कर्म रूपी संसार में आ इसके माया जाल में फंस जाता हैं और अपनी वास्तविक यात्रा व लक्ष्य को विसमृत कर देता हैं।

अतः मनुष्य को भी गंगा के सामान्य शांत, सहनशील और विस्तारित होना होगा। इस कलयुगी वातावरण में जो वैचारिक गंद सर्वत्र व्याप्त हैं, उसे उसी प्रकार स्वीकार करना होगा, जिस प्रकार माँ गंगा हमारे पापों को स्वीकार कर हमें  पवित्र और शुद्ध बनाए रखती है व स्वयं भी पवित्र रहती हैं। यही जीवन हैं-
 "जिसने इसे समझा वह तर गया और जो ना समझा वह उलझ गया।"

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