शांति
आज के कोलहालपूर्ण वातावरण में मनुष्य को जिस कि सबसे अधिक आवश्यकता है, वह 'शांति' हैं। मनुष्य के भीतर विद्यमान आत्मा की यही पुकार है की वह परम शांति को प्राप्त हो।
व्यक्ति भगा जा रहा है, क्षण भर के लिए भी उसके पास समय नहीं, इन्द्रियों के वशीभूत हो मनुष्य जिस सुख कि प्राप्ति हेतु भगा जा रहा हैं, वह क्षण भंगूर है, ना सुख है ! ना शांति !
आखिरकार शांति क्या है ? क्या एकांत ही शांति हैं ? नहीं एकांत में मनुष्य मात्र अकेला होता हैं किन्तु शांत नहीं। उसके भीतर गतिशील विचलित, भयभीत, आतीत कि स्मृतियों व भविष्य कि चिंता करता मन एकांत में भी निरंतर गतिशीलता के साथ मनुष्य को अशांत बनाये रखता हैं। जबकि मनुष्य के भीतर विद्यमान आत्मा अशांति से परे जा अपने वास्तविक स्वरुप पूर्ण सचितानंद शांति को प्राप्त करना चाहती है। शांति कुछ और नहीं आत्मसाक्षात्कार की वह अवस्था है, जहाँ सब कुछ ठहर चुका, मन कि गति, विचार इत्यादि। जहाँ कुछ नहीं, वही परम शून्य अवस्था 'शांति' है, वही 'शिव' है।
इसी शांति को प्राप्त करने हेतु मनुष्य आत्मसाक्षात्कार कि खोज में निकलता है, घोर तपस्या कर इन्द्रियों और इन्द्रियों के स्वामी मन पर विजय पा स्वयं शिव हो जाता है। जैन तीर्थंकर महावीर इस सत्य को पा 'जितेंद्र' कहलाये तो सिद्धांर्थ गौतम इस शांति को प्राप्त कर 'महात्मा बुद्ध' कहलाये तथा समस्त विश्व को सत्य, अहिंसा व शांति का पाठ पढ़ाया। हमारे परम पूज्य गुरुदेव पायलट बाबाजी इस परम शांति स्वरुप परमात्मा को पा 'महायोगी' कहलाये।
मनुष्य का अशांत मन सिर्फ उस तक सीमित नहीं रहता बल्कि यही अशांत मन समाज, राष्ट्र और विश्व को अशांति की ओर ले जा रहा है। सामाजिक स्तर पर व्याप्त विसंगतियां कुछ और नहीं मनुष्य के अशांत संस्कारों का परिणाम है। पारिवारिक स्तर पर रिश्तों में दरार, युवाओं में अवसाद, आत्महत्या का बढ़ता प्रचलन, सही राह से विचिलत हो गलत मार्ग पर चल पड़ना अशांत मन का ही नतीजा हैं।आज जो युद्ध के हालत वैश्विक स्तर पर बने हुए है इसका मुख्य कारण वृहद स्तर पर मन कि यह अशांत अवस्था ही है।
यूँ तो शांति को स्थापित करने हेतु कई प्रयास किये जा रहें है, किन्तु शांति कि इस स्थाई अवस्था को प्राप्त करने हेतु जो प्रसस्त मार्ग है, वह 'आध्यात्म' हैं। अध्यात्म को ही माध्यम बना शांति की परम अवस्था को ना सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि समाज, राष्ट्र और वैश्विक स्तर पर भी कायम किया जा सकता है।
अतः विश्व में शांति को स्थापित करने हेतु कई आध्यात्मिक प्रयास किये जा रहें है। इन्हीं प्रयासों में से परम पूज्य गुरुदेव पायलट बाबाजी व योग माता केको आईकवा जी के द्वारा पिछले 3 दशक से भी अधिक समय से 'विश्व शांति अभियान' के तहत कई देशों कि यात्रा कर आध्यात्मिकता का प्रचार प्रसार किया तथा मनुष्य को स्वयं की ओर लौटाने व परम शांति के बोध हेतु निरंतर प्रयत्नशील हैं । हमारा यही संकल्प है, मानव अपने वास्तविक स्वरुप को समझ अपने मूल अस्तित्व में लौट परम 'शांति' को प्राप्त हो।
आखिरकार शांति क्या है ? क्या एकांत ही शांति हैं ? नहीं एकांत में मनुष्य मात्र अकेला होता हैं किन्तु शांत नहीं। उसके भीतर गतिशील विचलित, भयभीत, आतीत कि स्मृतियों व भविष्य कि चिंता करता मन एकांत में भी निरंतर गतिशीलता के साथ मनुष्य को अशांत बनाये रखता हैं। जबकि मनुष्य के भीतर विद्यमान आत्मा अशांति से परे जा अपने वास्तविक स्वरुप पूर्ण सचितानंद शांति को प्राप्त करना चाहती है। शांति कुछ और नहीं आत्मसाक्षात्कार की वह अवस्था है, जहाँ सब कुछ ठहर चुका, मन कि गति, विचार इत्यादि। जहाँ कुछ नहीं, वही परम शून्य अवस्था 'शांति' है, वही 'शिव' है।
इसी शांति को प्राप्त करने हेतु मनुष्य आत्मसाक्षात्कार कि खोज में निकलता है, घोर तपस्या कर इन्द्रियों और इन्द्रियों के स्वामी मन पर विजय पा स्वयं शिव हो जाता है। जैन तीर्थंकर महावीर इस सत्य को पा 'जितेंद्र' कहलाये तो सिद्धांर्थ गौतम इस शांति को प्राप्त कर 'महात्मा बुद्ध' कहलाये तथा समस्त विश्व को सत्य, अहिंसा व शांति का पाठ पढ़ाया। हमारे परम पूज्य गुरुदेव पायलट बाबाजी इस परम शांति स्वरुप परमात्मा को पा 'महायोगी' कहलाये।
मनुष्य का अशांत मन सिर्फ उस तक सीमित नहीं रहता बल्कि यही अशांत मन समाज, राष्ट्र और विश्व को अशांति की ओर ले जा रहा है। सामाजिक स्तर पर व्याप्त विसंगतियां कुछ और नहीं मनुष्य के अशांत संस्कारों का परिणाम है। पारिवारिक स्तर पर रिश्तों में दरार, युवाओं में अवसाद, आत्महत्या का बढ़ता प्रचलन, सही राह से विचिलत हो गलत मार्ग पर चल पड़ना अशांत मन का ही नतीजा हैं।आज जो युद्ध के हालत वैश्विक स्तर पर बने हुए है इसका मुख्य कारण वृहद स्तर पर मन कि यह अशांत अवस्था ही है।
यूँ तो शांति को स्थापित करने हेतु कई प्रयास किये जा रहें है, किन्तु शांति कि इस स्थाई अवस्था को प्राप्त करने हेतु जो प्रसस्त मार्ग है, वह 'आध्यात्म' हैं। अध्यात्म को ही माध्यम बना शांति की परम अवस्था को ना सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि समाज, राष्ट्र और वैश्विक स्तर पर भी कायम किया जा सकता है।
अतः विश्व में शांति को स्थापित करने हेतु कई आध्यात्मिक प्रयास किये जा रहें है। इन्हीं प्रयासों में से परम पूज्य गुरुदेव पायलट बाबाजी व योग माता केको आईकवा जी के द्वारा पिछले 3 दशक से भी अधिक समय से 'विश्व शांति अभियान' के तहत कई देशों कि यात्रा कर आध्यात्मिकता का प्रचार प्रसार किया तथा मनुष्य को स्वयं की ओर लौटाने व परम शांति के बोध हेतु निरंतर प्रयत्नशील हैं । हमारा यही संकल्प है, मानव अपने वास्तविक स्वरुप को समझ अपने मूल अस्तित्व में लौट परम 'शांति' को प्राप्त हो।

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