अहिंसा
आज मनुष्य कहीं भटक गया हैं, अपने धर्म से अपने लक्ष्य से , स्वयं को मात्र देह मान अहंकार बोध के साथ हिंसा में संलग्न हो ना सिर्फ अपने पतन की ओर अग्रशील हैं बल्कि अपने अहिंसात्मक व्यवहार के कारण समस्त जगत के वातावरण को भी दूषित करने का जिम्मेदार वही हैं।
यही कारण है कि धर्म कि रक्षा हेतु अहिंसा का पालन अत्यंत आवश्यक है। इसी कारण कहा गया है -"अहिंसा परमो धर्मः ।।
(अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है)
वर्तमान में एक बड़ी समस्या है कि कहीं ना कहीं हमने अहिंसा के अर्थ को भी सीमित कर दिया हैं या हम समझ नहीं सकें।
सामान्य तौर पर अहिंसा को सिर्फ स्थूल शरीर तक सीमित कर देखा जाता है, कि हमारा बाहारी व्यवहार किसी के साथ हिंसात्मक ना हो, जैसे किसी के साथ मारपीट न करना, कटु वचन न बोलना इत्यादि ,परंतु मनुष्य को इसे प्रकार समझना होगा कि यदि सूक्ष्म शरीर के भीतर प्रभावित ऊर्जा को शुद्ध व पवित्र कर दिया जाये तो स्थूल शरीर से हिंसा का सवाल ही नहीं बनता।
योगशैली के अंतर्गत भी "अष्टांग योग" साधना के तहत मनुष्य को सूक्ष्म शरीर में भी अहिंसा का पालन करना होता है अर्थात मन के भीतर आने वाले विचारों में हिंसा न हो यदि मेरे भीतर किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, घृणा व क्रोध का विचार आता है, तो इसे भी हिंसा की श्रेणी में ही मान्य किया जाएगा। इसी अहिंसा का पालन कर उस परम सत्य ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग संभव हैं।
यही वज़ह है कि अहिंसा का महत्व ना सिर्फ सनातन धर्म में बल्कि बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध व जैन धर्म में तीर्थंकर महावीर जी ने भी अपने अपने शब्दों में व्यपाक व गहरे अर्थ वतलाये ।
पूज्य गुरुदेव महायोगी पायलट बाबाजी भी सदैव कहते है बेटा हिंसा मनुष्य के व्यवहार और धर्म के प्रतिकूल हैं, मनुष्य को अपने स्वभाव की ओर लौटना होगा, हिंसा का त्याग कर शांति, प्रेम, दया व क्षमा को माध्यम बना अपने परम लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा।
ये ना सिर्फ मनुष्य हेतु व्यक्तिगत रूप से अपरिहार्य हैं वरन समाज, राष्ट्र व विश्व के लिए भी अहिंसात्मक व्यवहार नीव का पत्थर हैं।
आज समाज में व्याप्त विसंगतियों के पीछे का मुख्य कारण यह हिंसा ही है, अतः अहिंसा को अपने व्यवहार में ला अपने मूल में लौट ना सिर्फ मनुष्य जीवन के यातार्थ को सिद्ध करें, वरन समस्त वातवरण को शुद्ध, शांति व प्रेममय बना ईश्वर की बनाई हुई इस अद्भुत कल्पना (संसार) को अधिक सुंदर व श्रेष्ठ बनाने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें।
ॐ नमोः नारायण 🙏🙏

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