भावनायें

भावनायें क्या हैं, ये विचारों से कितना पृथक हैं, इनमें ऐसी कौनसी शक्ति हैं जो विचारों को शक्ति शाली बना मनुष्य को लक्ष्य बेधने की क्षमता प्रदान करती हैं। कहा गया हैं विचारों में अनंत शक्ति होती हैं, किन्तु मैंने अनुभव किया की विचार यदि भावना रहित हैं तो शून्य तुल्य हैं।

सकारात्मक भावनायें - प्रार्थना, भक्ति, करुणा, प्रेम, संवेदना, क्षमा इत्यादि हैं।
नकारात्मक भावनायें -क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष राग, मोह आसक्ति इत्यादि।

मनुष्य के लिए यह विडंबना है की नकारात्मक भावनाओं को लाने के लिए मनुष्य को प्रयास नहीं करना होता। वह तो स्वतः इन भावनाओं में लिप्त हो हमें, समाज व सम्पूर्ण वातावरण को हानि पंहुचा रहें हैं।

बल्कि प्रार्थना भक्ति जैसे भाव स्वतः ही प्रतेक मनुष्य में सरलता से नहीं मिलते, एवं जो इन्हें विकसित करना चाहते हैं उनके लिए अत्यंत दुष्कर हैं।
भावना क्या हैं ? जब इस प्रश्न का उत्तर मैंने टटोलना चाहा तो पाया....

भावना कुछ और नहीं आत्मा की अचूक शक्ति है। चूकि मनुष्य आज अपने कई जन्मों के दूषित संस्करों के चलते आत्मा से अत्यधिक दूर जा चुका हैं। इसलिए उसके लिए आत्मा की पवित्रता सकारात्मक भावनाओं को पाना सरल नहीं।

भावनाओं के महत्व को इस प्रकार समझे।जैसे आँखो से अश्रु आना अत्यधिक दुख, करुणा और दया भाव का सूचक है, कभी कभी अत्यधिक खुशी के कारण भी मन भाव विभोर हो रो पड़ता हैं। किन्तु जब फ़िल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेता से कहा जाता है की तुम्हें इस सीन में रोना है। परन्तु भावनाओं के आभाव में निर्देशक बार बार अभिनेता से कहता है की भावनाओं के साथ सॉट दो तभी उसमे वास्तविकता का एहसास होगा।

एक ओर उदहारण देखे प्याज़ काटते समय आँखो से आँसू बहने लगते है, किन्तु ये स्थिति भावना की अनुपस्थित में होती है इसलिय मात्र आँसू बन रह जाती हैं, यहां तक यह क्रिया तो आँखो की सफाई के लिए जानी जाती हैं।

एक और प्रचलन आज कल चल पड़ा है हास्य योग, हमने कई शहरों में देखा सुबह और सांध्य लोग पार्क में बिना भावनाओं के हस्ते और खिलखिलाते हुए देखते हैं। प्रश्न उठता है की जिस हसीं और खिलखिलाहट में भावना नहीं उसका क्या उचित लाभ शरीर और मन को मिल सकेगा। जो मैंने अनुभव किया उसके अनुरूप तो बिना भावनाओं के यह शरीर उस कटपुतली और रोबोट के सामान्य है जिसे मानव ने निर्मित किया। भावना तो ईश्वर की अचूक शक्ति है जिसे ईश्वर के समीप पहुंच ही प्राप्त किया जा सकता हैं।

जितना आप स्वयं के करीब आएंगे आत्मा की शक्ति सकारात्मक भावनाओं के साथ आप को पवित्रता प्रदान करेंगी। एवं जितना मनुष्य स्वयं से दूर जायेगा, वह नकारात्मक भावनाओं के फेरे में बंध जाएंगा ।

हमारे पूज्य गुरुदेव महा योगी पायलट बाबाजी कहते है
 " अपनी ओर लौटो, स्वयं को पेहचानो, ठहरों तथा स्वयं के साथ जुड़ शक्ति का विस्तार कर स्वयं के कल्याण के साथ समाज, राष्ट्र व सृष्टि के कल्याण हेतु अपना योगदान सुनिश्चित करे ।"
यही जीवन का सार है और भावनाओ की सरल व्याख्या।

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