गुरु
गुरु शब्द ही ऐसा है जिसे सुनने मात्र से एक सकारात्मक ऊर्जा का आभास होता हैं। गुरु मात्र एक शब्द या व्यक्ति नही बल्कि एक भावना हैं, आस्था हैं,श्रद्धा हैं, विश्वास हैं।
जो व्यक्ति जीवन में गुरुतत्व के साथ जीता है, उसका जीवन स्वतः ही सार्थक बन जाता हैं। गुरु का अर्थ है वह जो अन्धकार को समाप्त कर प्रकाशमान की ओर ले जाये। जैसे शिक्षा और ज्ञान अन्धकार रूपी अज्ञान से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। सनातन वैदिक हिन्दू धर्म के अनेक धर्म ग्रन्थों ने गुरु महिमा को समवेत स्वर से गाया है। उपनिषदों का तो सृजन ही गुरु शिष्य के मध् हुए संवादों से हुआ है।
देखा जाए तो बाल्यकाल से अब तक हमने जहाँ से भी शिक्षा पाई है, जिससे भी कुछ ज्ञान ग्रहण किया है वह सब हमारे गुरु हैं। जैसे माता - पिता, हमारे परिवारजन, विद्यालय के शिक्षक, प्रकृति व अन्य सभी वह प्राणी, पुस्तक, समाज जो पल पल हमें आ शिक्षा देते रहे हैं। लेकिन हमें शिक्षक और गुरु के भेद को समझना होगा। सभी प्रकार की लौकिक एवं भौतिक शिक्षा देने वाले व्यक्ति हमारे शिक्षक हो सकते हैं लेकिन गुरु वह जो जीवन में व्याप्त अज्ञान (इग्नोरेंस ) को सर्वदा के लिए मिटा हमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हैं। इस मार्ग पर हमारा मार्ग दर्शन करता हैं। एवं अन्त में हमें स्वयं का साक्षात्कार करा देता है। जो व्यक्ति जीवन में गुरुतत्व के साथ जीता है, उसका जीवन स्वतः ही सार्थक बन जाता हैं। गुरु का अर्थ है वह जो अन्धकार को समाप्त कर प्रकाशमान की ओर ले जाये। जैसे शिक्षा और ज्ञान अन्धकार रूपी अज्ञान से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। सनातन वैदिक हिन्दू धर्म के अनेक धर्म ग्रन्थों ने गुरु महिमा को समवेत स्वर से गाया है। उपनिषदों का तो सृजन ही गुरु शिष्य के मध् हुए संवादों से हुआ है।
वर्तमान के व्यव्सायिक युग में गुरु तो अनेक मिल सकते हैं, परन्तु सद्गुरु को पाना हमारे पुण्य कर्मों पर निर्भर करता हैं। सद्गुरु अर्थात ऐसे गुरु जो हमें सत्य की ओर ले जाये।
"सत्य क्या हैं " वही जो अजर हैं, अमर हैं। तीनों काल- भूत,भविष्य व वर्तमान में अपरिवर्तनशील है। वही जो तीनों अवस्था- जाग्रत, स्वप्न और सुषप्ति का साक्षी हैं। वही सत्य है। वही शिव हैं"।
सत्य को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, मात्र अनुभव किया जाता है जो कि सिर्फ और सिर्फ तभी सम्भव हैं जब आपके पास सामर्थ्य गुरु हो, सद्गुरु हो।
हम सभी बहुत भाग्यशाली हैं अथवा हमारे कई जन्मों के संचित पुण्य कर्मों का फल है कि हमने पूज्य महायोगी पायलट बाबाजी को गुरु के रूप में पाया। सत्य का मार्ग अत्यन्त दुष्कर है कई जन्मों की यात्रा करके भी जीव जन्म मरण के फेरे से बाहर नहीं आ पाता। किन्तु हमारे लिए यह सम्भव हो सका है क्योंकि बाबाजी के रूप में हमें सद्गुरु प्राप्त हुए है, बाबाजी स्वयं कहते है - बेटा गुरु उस पुल की भाँति है जिसे आप माध्यम बना उस परमतत्व, परमसत्ता, परमात्मा वा सत्य तक पहुँच सकते हैं जो जीव की बृहद यात्रा का अन्तिम पडाव हैं।
गुरु होना सरल नहीं, उसमे भी सद्गुरु होना अर्थात शिष्य को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना उसे उसके परम सत्य से साक्षात्कार तक का मार्ग चित्र देना। मैंने बाबाजी को एक ऐसे गुरु के रूप में देखा जिन्होंने शनै: शनै: अपने शिष्य की सांसारिक कामनाओं को समाप्त किया। जब भी उनके शिष्य पर संकट आया, दौडे चले आये। कई बार प्रत्यक्ष रूप में, कई बार अप्रत्यक्ष रूप से।
उन्हें मैंने अपने शिष्यों के कष्ट और दुख को स्वयं पर लेते पाया । जब भी कोई प्रश्न मन में बार बार आता है जिसका उत्तर कही नहीं मिलता। बाबा बडी सहजता से अन्य शिष्यों से वार्तालाप करते हुए उनका उत्तर दे देते हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्र,समाज और विश्व कल्याण के लिए जो उनकी भूमिका है उसके लिए तो शब्दों का आभाव है ।
ऐसे अनुभव मात्र मेरे नहीं वरन अन्य कई लोगो से सुने हैं मैंने।
आप सभी को गुरुपूर्णिमा की अनेकों अनेक शुभकामनायें। बाबाजी के सानिध्य में हम सभी उस सत्य तक पहुँचे जिसे पाकर स्वयं बाबाजी ने सत्य से साक्षात्कार कर सृष्टि के कल्याण हेतु अपना बृहद योगदान दिया है । ऐसी हमारी ईश्वर व पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना हैं।
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