ब्रह्मचर्य
जब भी साधना की चर्चा होती हैं तो इस के तहत की जाने वाली ब्रह्मचर्य साधना को अधिक कठिन और नियमों के अनुरूप चलने वाली साधना के रूप में जाना जाता हैं।
ब्रह्मचर्य एक ऐसी साधना हैं जिसे ना सिर्फ सनातन धर्म के ष्ठ : दर्शनों में योग दर्शन के तहत अष्टांग योग में विशेष स्थान प्राप्त है, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी ब्रह्मचर्य को विशेष और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं।
ज़ब इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं की वैदिक काल के समय जीवन को सुव्यवस्थित ठंग से जीने हेतु अत्यंत सुन्दर तरीके से विभाजित किया गया-
* ब्रह्मचर्य( 5 वर्ष से लेकर 25वर्ष तक )
* गृहस्थ ( 25 से 50 वर्ष तक )
* वान प्रस्थ ( 50 से 75 तक )
* संयस्थ (75 से...)
अतः हमने देखा की ब्रह्मचर्य साधना का कई धर्मों में विशेष स्थान हैं। किन्तु सामान्य जीवन में हम कही ना कही इस विषय पर चर्चा करने से कतराते हैं या संकोच करते हैं। तो आज हम इस लेख में ब्रह्मचर्य का अर्थ और इसके महत्व को जनाने का प्रयास करेंगे।
ब्रह्मचर्य को यदि सरल भाषा में समझें तो यह दो शब्दों का मेल हैं - ब्रह्म और चर्य, 'ब्रह्म' अर्थात सर्वस्य, सर्वत्र परमात्मा, हमारे वेदों में भी "अहम ब्रह्मस्मी " जैसे वाक्यों में सर्वशक्तिमान परमात्मा से ही तात्पर्य हैं एवं 'चर्य' से तात्पर्य आचरण से हैं। तो इस शब्द का पूर्ण अर्थ हुआ परमात्मा तक पहुंचने या उसको पाने के लिए अपना गया आचरण ब्रह्मचर्य हैं।
तो उस परमात्मा तक पहुंचने हेतु कोन सा आचरण को अपनाये क्योंकि वह 'सत्य' भी हो सकता है, 'असत्य' , 'अप्रिग्रह 'और 'ब्रह्मचर्य' ये सभी को अपना कर आचरण को शुद्ध किया जाता हैं किन्तु इन सब में जो अधिक कठिन और नियम बद्ध हैं वह 'ब्रह्मचर्य 'हैं।
हम यम, नियम जैसे सिद्धांतो को इसलिए साधना में शामिल करते हैं ताकि मन शुद्ध हो, यदि आचरण गलत तो मन अशुद्ध विचारों से भरा रहेगा और ऐसे अशुद्ध मन के साथ उस परमसत्ता को प्राप्त करना असंभव हैं। ये सभी प्रकार की अशुद्धता मन के भटकाव का कारण हैं और हमारे मन को सबसे अधिक भटकाने वाली ऊर्जा जो इस देह में हैं वो हैं 'काम ऊर्जा' ।
ज़ब साधक साधना में आगे बढ़ता हैं तो उस दौरान जो ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक हैं वह हैं काम ऊर्जा। इस चंचल मन को स्थिर करने के सारे प्रयास एक झण और पल में विखरेने वाली काम ऊर्जा अत्यंत शक्तिशाली हैं, इसलिय हमारे ऋषि मुनि और मनीषीयों ने बड़े अध्ययन और अनुभवों के पश्चायत ब्रह्मचर्य को साधना का प्रमुख और महत्वपूर्ण अंग बताया।
यही कारण रहा की वैदिक काल में आरम्भ के 5 से 25 वर्षों में ब्रह्मचर्य व्रत के पालन के साथ बच्चों का जीवन आरम्भ होता हैं। आरम्भ के 25 वर्ष ही ज़ब एकाग्रता के साथ छात्र को जीवन की सभी प्रकार की शिक्षाओं को ग्रहण करना हैं। और यही वह समय काल हैं ज़ब मनुष्य शरीर में काम ऊर्जा अपने चरम पर होती हैं, इसलिए जीवन को सही दिशा देने हेतु इन वर्षों में ब्रह्मचर्य को अपनाना अत्यंत आवशयक हो गया ताकि सम्पूर्ण ऊर्जा को सही दिशा दे जीवन को सही ओर ले जाया जा सके, ज़ब इस प्रकार जीवन आरम्भ होता हैं तो समाज के समक्ष राम जैसे चरित्र समक्ष आते, महान ऋषि, मुनि, तपस्वी, मनीषी जिन्होंने वेदों जैसे महान ग्राथों को लिपिबद्ध कर असंभव को संभव कर दिखाया ।
यदि आज के परिवेश की बात करें तो ब्रह्मचर्य जैसे विषयों पर संकोच और अन्य कारण से युवा परिचित ही नहीं हैं परिणाम वह अपने सीखने के काल के समय ही इस ऊर्जा में बह जाता हैं और आगे की प्रथम सीढ़ी ही ज़ब गलत चढ़े तो आगे का पूरा रास्ता धुंधला हो जाता हैं और आज यही देखने को मिल रहा हैं। कारण हैं की हम इस विषय पर बात ही नहीं करना चाहते और ना ही इन विषयों को समझते हैं क्योंकि पूर्व से सीखा हुआ पाठ और सबक भविष्य में गलत आचरण होने से बचाता हैं।
एवं यदि साधक की बात की जाए तो उसे अंतिम पढ़ाव तक इस नियम को जीवन में लागू करना होता हैं। तभी वह परम सत्य परमात्मा ईश्वर को पा सकता हैं। ब्रह्मचर्य का पालन कर साधक जहाँ परमात्मा को प्राप्त कर सकता हैं तो वही साधारण मनुष्य इस आचरण का पालन कर एक सभ्य समाज की स्थापना कर सकता हैं।
ब्रह्मचर्य एक ऐसी साधना हैं जिसे ना सिर्फ सनातन धर्म के ष्ठ : दर्शनों में योग दर्शन के तहत अष्टांग योग में विशेष स्थान प्राप्त है, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी ब्रह्मचर्य को विशेष और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं।
ज़ब इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं की वैदिक काल के समय जीवन को सुव्यवस्थित ठंग से जीने हेतु अत्यंत सुन्दर तरीके से विभाजित किया गया-
* ब्रह्मचर्य( 5 वर्ष से लेकर 25वर्ष तक )
* गृहस्थ ( 25 से 50 वर्ष तक )
* वान प्रस्थ ( 50 से 75 तक )
* संयस्थ (75 से...)
अतः हमने देखा की ब्रह्मचर्य साधना का कई धर्मों में विशेष स्थान हैं। किन्तु सामान्य जीवन में हम कही ना कही इस विषय पर चर्चा करने से कतराते हैं या संकोच करते हैं। तो आज हम इस लेख में ब्रह्मचर्य का अर्थ और इसके महत्व को जनाने का प्रयास करेंगे।
ब्रह्मचर्य को यदि सरल भाषा में समझें तो यह दो शब्दों का मेल हैं - ब्रह्म और चर्य, 'ब्रह्म' अर्थात सर्वस्य, सर्वत्र परमात्मा, हमारे वेदों में भी "अहम ब्रह्मस्मी " जैसे वाक्यों में सर्वशक्तिमान परमात्मा से ही तात्पर्य हैं एवं 'चर्य' से तात्पर्य आचरण से हैं। तो इस शब्द का पूर्ण अर्थ हुआ परमात्मा तक पहुंचने या उसको पाने के लिए अपना गया आचरण ब्रह्मचर्य हैं।
तो उस परमात्मा तक पहुंचने हेतु कोन सा आचरण को अपनाये क्योंकि वह 'सत्य' भी हो सकता है, 'असत्य' , 'अप्रिग्रह 'और 'ब्रह्मचर्य' ये सभी को अपना कर आचरण को शुद्ध किया जाता हैं किन्तु इन सब में जो अधिक कठिन और नियम बद्ध हैं वह 'ब्रह्मचर्य 'हैं।
हम यम, नियम जैसे सिद्धांतो को इसलिए साधना में शामिल करते हैं ताकि मन शुद्ध हो, यदि आचरण गलत तो मन अशुद्ध विचारों से भरा रहेगा और ऐसे अशुद्ध मन के साथ उस परमसत्ता को प्राप्त करना असंभव हैं। ये सभी प्रकार की अशुद्धता मन के भटकाव का कारण हैं और हमारे मन को सबसे अधिक भटकाने वाली ऊर्जा जो इस देह में हैं वो हैं 'काम ऊर्जा' ।
ज़ब साधक साधना में आगे बढ़ता हैं तो उस दौरान जो ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक हैं वह हैं काम ऊर्जा। इस चंचल मन को स्थिर करने के सारे प्रयास एक झण और पल में विखरेने वाली काम ऊर्जा अत्यंत शक्तिशाली हैं, इसलिय हमारे ऋषि मुनि और मनीषीयों ने बड़े अध्ययन और अनुभवों के पश्चायत ब्रह्मचर्य को साधना का प्रमुख और महत्वपूर्ण अंग बताया।
यही कारण रहा की वैदिक काल में आरम्भ के 5 से 25 वर्षों में ब्रह्मचर्य व्रत के पालन के साथ बच्चों का जीवन आरम्भ होता हैं। आरम्भ के 25 वर्ष ही ज़ब एकाग्रता के साथ छात्र को जीवन की सभी प्रकार की शिक्षाओं को ग्रहण करना हैं। और यही वह समय काल हैं ज़ब मनुष्य शरीर में काम ऊर्जा अपने चरम पर होती हैं, इसलिए जीवन को सही दिशा देने हेतु इन वर्षों में ब्रह्मचर्य को अपनाना अत्यंत आवशयक हो गया ताकि सम्पूर्ण ऊर्जा को सही दिशा दे जीवन को सही ओर ले जाया जा सके, ज़ब इस प्रकार जीवन आरम्भ होता हैं तो समाज के समक्ष राम जैसे चरित्र समक्ष आते, महान ऋषि, मुनि, तपस्वी, मनीषी जिन्होंने वेदों जैसे महान ग्राथों को लिपिबद्ध कर असंभव को संभव कर दिखाया ।
यदि आज के परिवेश की बात करें तो ब्रह्मचर्य जैसे विषयों पर संकोच और अन्य कारण से युवा परिचित ही नहीं हैं परिणाम वह अपने सीखने के काल के समय ही इस ऊर्जा में बह जाता हैं और आगे की प्रथम सीढ़ी ही ज़ब गलत चढ़े तो आगे का पूरा रास्ता धुंधला हो जाता हैं और आज यही देखने को मिल रहा हैं। कारण हैं की हम इस विषय पर बात ही नहीं करना चाहते और ना ही इन विषयों को समझते हैं क्योंकि पूर्व से सीखा हुआ पाठ और सबक भविष्य में गलत आचरण होने से बचाता हैं।
एवं यदि साधक की बात की जाए तो उसे अंतिम पढ़ाव तक इस नियम को जीवन में लागू करना होता हैं। तभी वह परम सत्य परमात्मा ईश्वर को पा सकता हैं। ब्रह्मचर्य का पालन कर साधक जहाँ परमात्मा को प्राप्त कर सकता हैं तो वही साधारण मनुष्य इस आचरण का पालन कर एक सभ्य समाज की स्थापना कर सकता हैं।
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