जीवन में आध्यात्म
जीवन हैं तो संघर्ष है, इसी संघर्ष से गुजरते हुए जो समतल जीवन व्यतीत करता हैं, वास्तव में वही विजेता हैं,
आज गृहस्थ जीवन के अपने संघर्ष हैं, संयस्थ के अपने, छात्र जीवन के अपने, जो इन्हे समझते हुए आगे बढ़ता हैं वही जीवन में सफलता और सार्थकता को पाता हैं ...
तो हम में से अधिकांश इस संघर्ष से लड़ते लड़ते जीवन में उलझ से जाते हैं और यही से जीवन में आरम्भ होता है तनाव, चिंता, भय जो आगे जा कर रोग का कारण बनता हैं।
आज प्रतेक मनुष्य के जीवन में यही उलझने तनाव का कारण हैं, गृहस्थ जीवन में पति पत्नी के मध्य तनाव, पारिवारिक कलेश, छात्र जीवन में प्रतिस्पर्धा और उच्च रोजगार पाने का तनाव, नौकरी में ऊंचे पद सम्मान पाने के लिए खींचा तानी, राजनैतिक स्तर पर सत्ता को पाने के लिए उठा पटक। आज प्रतेक क्षेत्र व जीवन में इस प्रकार का तनाव, चिंता देखना सामान्य है।
इसे समझने हेतु हमें जीवन को समझना होगा, आज क्यों यह स्थिति उत्पन्न हुई, इस का मुख्य कारण हैं हम अपने मूल से दूर हो चुके, उस ज्ञान व परम्परा से जो आध्यात्म की जननी रही। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और गीता का यदि निरंतर अध्ययन शील हो चिंतन मनन किया जाये , योग को जीवन में ग्रहण किया जाये तो आज इन तनाव से भरी समस्यायों से उभर सार्थकता व सफलता की ओर जाये जा सकता हैं।
गीता में हर उस प्रश्नन का उत्तर है जो आज व्यक्ति अपने जीवन में देख रहा हैं,आज हम भी अर्जुन की भांति अपना अपना युद्ध लड़ रहें हैं, उसी प्रकार रामायण में श्री राम के चरित्र को आत्मसत कर कई समस्यायों पर आसानी से विजय पाई जा सकती हैं। हमने रामायण में भगवान श्री राम के राज अभिषेक के समय हर वह परिस्थिति को पाया जो आज हमारे घर में भी कलेश का कारण हैं अंतर मात्र इतना है की उन्होंने सदैव धैर्य और सहन शीलता को जीवन में उच्च स्थान दिया और हम जिसे पूर्णतः भूल चुके हैं।
श्री राम के धैर्य, सहनशीलता, क्षमा, करुणा जैसे देवीये गुणों को हमें आत्मसात करना होगा। तो वही उपनिषद दर्शन ग्रन्थ हैं जहाँ बड़ी सरलता के साथ जीवन की गुत्थी को सुलझाया गया है। पुराण कथा के माध्यम से जीवन के कई अनसुलझे प्रश्ननो का ना सिर्फ उत्तर देते हैं बल्कि ब्रह्माडियें रहस्ययों का जनाने का बेहतर विकल्प हैं।
यदि पूर्व के युगों को देखें तो उस काल में जीवन इस प्रकार नहीं था उसकी मुख्य वजह थी आध्यात्म के साथ हमारा तादातम्य और इस हेतु आध्यात्म को मार्ग बनना होगा.. समन्वय बैठना होगा आध्यात्म के संग समन्वय बना चलना होगा। यह ये समझना आवश्यक है की आध्यात्म क्या हैं, आध्यात्म का अर्थ यह नहीं की हम हाथ में माला पकड़ भक्ति में लीन हो जाये, आध्यात्म जीवन शैली हैं, जिसके साथ समन्वय बना व्यक्ति प्रतेक क्षेत्र में सफल हो जीवन को सार्थकता की ओर ले जा सकता हैं।
इस हेतु हमें अपनी जड़ो की ओर लौटना होगा, अपने बच्चों व परिवार को अपने मूल ज्ञान व परम्परा से परिचित करना होगा। यही ज्ञान विवेक को जाग्रत करने का माध्यम बनेगा , तथा विवेकशील व्यक्ति सरलता से जीवन में आई चुनोतियाँ, संघर्ष व समस्यायों को देखता हुआ आगे बढ़ चलेगा साक्षी भाव के साथ। यही जीवन को जीने का उचित माध्यम हैं।🙏🙏
आज गृहस्थ जीवन के अपने संघर्ष हैं, संयस्थ के अपने, छात्र जीवन के अपने, जो इन्हे समझते हुए आगे बढ़ता हैं वही जीवन में सफलता और सार्थकता को पाता हैं ...
तो हम में से अधिकांश इस संघर्ष से लड़ते लड़ते जीवन में उलझ से जाते हैं और यही से जीवन में आरम्भ होता है तनाव, चिंता, भय जो आगे जा कर रोग का कारण बनता हैं।
आज प्रतेक मनुष्य के जीवन में यही उलझने तनाव का कारण हैं, गृहस्थ जीवन में पति पत्नी के मध्य तनाव, पारिवारिक कलेश, छात्र जीवन में प्रतिस्पर्धा और उच्च रोजगार पाने का तनाव, नौकरी में ऊंचे पद सम्मान पाने के लिए खींचा तानी, राजनैतिक स्तर पर सत्ता को पाने के लिए उठा पटक। आज प्रतेक क्षेत्र व जीवन में इस प्रकार का तनाव, चिंता देखना सामान्य है।
इसे समझने हेतु हमें जीवन को समझना होगा, आज क्यों यह स्थिति उत्पन्न हुई, इस का मुख्य कारण हैं हम अपने मूल से दूर हो चुके, उस ज्ञान व परम्परा से जो आध्यात्म की जननी रही। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और गीता का यदि निरंतर अध्ययन शील हो चिंतन मनन किया जाये , योग को जीवन में ग्रहण किया जाये तो आज इन तनाव से भरी समस्यायों से उभर सार्थकता व सफलता की ओर जाये जा सकता हैं।
ऐसा नहीं है की यह समस्याएं केवल इस युग की हैं, ये प्रतेक युग में रही बस अंतर मात्र इतना था की पूर्व के जैसे सत युग में मनुष्य जीवन में यह समस्या ना के बारबर रही कारण था हम अपने मूल जड़ो से जुड़े हुए थे चाहे गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली हो या फिर वैदिक को आधार बना जीवन को व्यवस्थित व संतुलित बनाते हुए चार भागों में विभक्त करना - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास। ज़ब जीवन को समझ और अनुभव करते हुए मनुष्य जीवन पथ पर चलता है तो समस्या होने का सबाल ही नहीं बनता और हमारे शास्त्र और ग्रन्थ जीवन को समझ कर जीने हेतू प्रबल बल देते हैं। किन्तु हमने इतिहास में यह भी देखा की जैसे जैसे युग में परिवर्तन आया हम अपने मूल से दूर होते गए और आज इस कलयुग में यह दूरी अत्याथिक बड़ चुकी हैं जो समस्या का मूल कारण हैं।
गीता में हर उस प्रश्नन का उत्तर है जो आज व्यक्ति अपने जीवन में देख रहा हैं,आज हम भी अर्जुन की भांति अपना अपना युद्ध लड़ रहें हैं, उसी प्रकार रामायण में श्री राम के चरित्र को आत्मसत कर कई समस्यायों पर आसानी से विजय पाई जा सकती हैं। हमने रामायण में भगवान श्री राम के राज अभिषेक के समय हर वह परिस्थिति को पाया जो आज हमारे घर में भी कलेश का कारण हैं अंतर मात्र इतना है की उन्होंने सदैव धैर्य और सहन शीलता को जीवन में उच्च स्थान दिया और हम जिसे पूर्णतः भूल चुके हैं।
श्री राम के धैर्य, सहनशीलता, क्षमा, करुणा जैसे देवीये गुणों को हमें आत्मसात करना होगा। तो वही उपनिषद दर्शन ग्रन्थ हैं जहाँ बड़ी सरलता के साथ जीवन की गुत्थी को सुलझाया गया है। पुराण कथा के माध्यम से जीवन के कई अनसुलझे प्रश्ननो का ना सिर्फ उत्तर देते हैं बल्कि ब्रह्माडियें रहस्ययों का जनाने का बेहतर विकल्प हैं।
यदि पूर्व के युगों को देखें तो उस काल में जीवन इस प्रकार नहीं था उसकी मुख्य वजह थी आध्यात्म के साथ हमारा तादातम्य और इस हेतु आध्यात्म को मार्ग बनना होगा.. समन्वय बैठना होगा आध्यात्म के संग समन्वय बना चलना होगा। यह ये समझना आवश्यक है की आध्यात्म क्या हैं, आध्यात्म का अर्थ यह नहीं की हम हाथ में माला पकड़ भक्ति में लीन हो जाये, आध्यात्म जीवन शैली हैं, जिसके साथ समन्वय बना व्यक्ति प्रतेक क्षेत्र में सफल हो जीवन को सार्थकता की ओर ले जा सकता हैं।
इस हेतु हमें अपनी जड़ो की ओर लौटना होगा, अपने बच्चों व परिवार को अपने मूल ज्ञान व परम्परा से परिचित करना होगा। यही ज्ञान विवेक को जाग्रत करने का माध्यम बनेगा , तथा विवेकशील व्यक्ति सरलता से जीवन में आई चुनोतियाँ, संघर्ष व समस्यायों को देखता हुआ आगे बढ़ चलेगा साक्षी भाव के साथ। यही जीवन को जीने का उचित माध्यम हैं।🙏🙏
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