जन्मभूमि
क्या कभी हमने विचार किया है की इस भौतिक संसार में परिवार और बंधनों में जकड़ा जीवन सांसारिक माया के झांसे में आकर बहुत सीमित हो जाता हैं, जबकि मनुष्य जीवन का उदय असीमित, असीम और बंधनों से मुक्त हो कर उन विचारों और रहस्यों को ज्ञात कर परमतत्व को पाने के लिए हुआ हैं।
इन्ही में से एक गहन प्रश्न या विचार है की मनुष्य जीव के रूप में हम एक विशेष स्थान पर ही जन्म क्यों लेते हैं ? जैसे मेरा जन्म म. प्र. के शिवपुरी जिले के ग्राम दिनारा में हुआ, मेरी ही दो बहनों में से एक का जन्म शिवपुरी तो दूसरी का झाँसी हुआ। ऐसा क्यों इनका जन्म भी दिनारा क्यों नहीं हुआ या फिर मेरा जन्म झाँसी या देश के किसी और स्थान या विदेश में क्यों नहीं हुआ ?
प्रश्न के उत्तर को ज़ब मैंने खोजा एवं जो उत्तर पाया व अनुभव किया तो जाना इसके पीछे कर्म बंधन और कई जन्मों से चली आ रही संस्कारो की कड़ी हैं, जैसे मैंने जिन माता पिता के परिवार में जन्म लिया उनसे और उनके गहन रिश्तों के साथ मेरे पूर्वजन्मों के संस्कारों और कर्मों की एक कड़ी चली आ रही हैं, जिस कारण मैंने इस परिवार में जन्म लिया।
बस इसी प्रकार जिस भूमि पर हमने जन्म लिया उसका कुछ क़र्ज़ है हम पर बकाया। हमने इस भूमि से वायु, जल लिया तथा उसे कई प्रकार से दूषित किया व बदले में उसे कुछ नहीं दिया। हमने तो मृत्यु के उपरांत नया जन्म पाया किन्तु उस ईश्वर के पास पाई पाई का हिसाब हैं। हमारे ऋण को चुकता करने हेतु उसने हमें पुनः भेजा। किन्तु हम माया में उलझ जन्म मृत्यु के फेरे में पड़े रहते हैं ज़ब तक हमारे कर्म बंधन समाप्त नहीं हो जाते। वास्तव में कर्म बंधन उस ऋण के सामान हैं जिसे चुकता करने के लिए हम बार बार जन्म लेते हैं। किन्तु अज्ञान और माया के फेरे में आकर हम इन कर्मबंधनों को काटते तो नहीं बल्कि नये कर्म बंधन बनाते जाते हैं। इसलिए हमने अकसर लोगों को अपनी जन्मभूमि के लिए बहुत कुछ करते पाया। इसका मुख्य कारण हैं, उन्हें भली भांति बोध है की इस भूमि के ऋण को चूकना है। इसलिए वे अपनी जन्मभूमि पर समाज सेवा से संबंधित कार्य या मंदिर और अस्पताल का निर्माण करवाते हैं।
अतः बाबाजी ने 13 वे ज्योतिर्लिंग को खोज उसे स्थापित कर ना सिर्फ अपने अनेक जन्मों के अनेक प्रकार के ऋण को चुकता किया बल्कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अनुग्रह प्रदान कर कल्याणकारी और परोपकार कार्य किया।
इन्ही में से एक गहन प्रश्न या विचार है की मनुष्य जीव के रूप में हम एक विशेष स्थान पर ही जन्म क्यों लेते हैं ? जैसे मेरा जन्म म. प्र. के शिवपुरी जिले के ग्राम दिनारा में हुआ, मेरी ही दो बहनों में से एक का जन्म शिवपुरी तो दूसरी का झाँसी हुआ। ऐसा क्यों इनका जन्म भी दिनारा क्यों नहीं हुआ या फिर मेरा जन्म झाँसी या देश के किसी और स्थान या विदेश में क्यों नहीं हुआ ?
प्रश्न के उत्तर को ज़ब मैंने खोजा एवं जो उत्तर पाया व अनुभव किया तो जाना इसके पीछे कर्म बंधन और कई जन्मों से चली आ रही संस्कारो की कड़ी हैं, जैसे मैंने जिन माता पिता के परिवार में जन्म लिया उनसे और उनके गहन रिश्तों के साथ मेरे पूर्वजन्मों के संस्कारों और कर्मों की एक कड़ी चली आ रही हैं, जिस कारण मैंने इस परिवार में जन्म लिया।
बस इसी प्रकार जिस भूमि पर हमने जन्म लिया उसका कुछ क़र्ज़ है हम पर बकाया। हमने इस भूमि से वायु, जल लिया तथा उसे कई प्रकार से दूषित किया व बदले में उसे कुछ नहीं दिया। हमने तो मृत्यु के उपरांत नया जन्म पाया किन्तु उस ईश्वर के पास पाई पाई का हिसाब हैं। हमारे ऋण को चुकता करने हेतु उसने हमें पुनः भेजा। किन्तु हम माया में उलझ जन्म मृत्यु के फेरे में पड़े रहते हैं ज़ब तक हमारे कर्म बंधन समाप्त नहीं हो जाते। वास्तव में कर्म बंधन उस ऋण के सामान हैं जिसे चुकता करने के लिए हम बार बार जन्म लेते हैं। किन्तु अज्ञान और माया के फेरे में आकर हम इन कर्मबंधनों को काटते तो नहीं बल्कि नये कर्म बंधन बनाते जाते हैं। इसलिए हमने अकसर लोगों को अपनी जन्मभूमि के लिए बहुत कुछ करते पाया। इसका मुख्य कारण हैं, उन्हें भली भांति बोध है की इस भूमि के ऋण को चूकना है। इसलिए वे अपनी जन्मभूमि पर समाज सेवा से संबंधित कार्य या मंदिर और अस्पताल का निर्माण करवाते हैं।
इस वाक्यांश को मेरे द्वारा अनुभव किए गए उदाहरण से समझते हैं। वर्ष 2022 नवम्बर में पूज्य गुरुदेव पायलट बाबाजी द्वारा भी अपनी जन्म भूमि सासाराम में एक भव्य, विशाल और कलाकृति के अद्भुत नमूने के रूप में शिवमंदिर का निर्माण कराया जो की पूर्वोत्तर सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता हैं। आज यह स्थल अत्यंत कम समय में पर्यटको के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र व शिव भक्तों के लिए साधना का प्रमुख केंद्र बन के उभरा हैं। इस मंदिर का निर्माण व लोकार्पण के समय कई प्रश्न गुरुदेव के लिए भी उठाये गए की वे अपनी जन्मस्थली पर निर्माण कर मोह में फस गए हैं। इसे मैं इस प्रकार से लेती हूं की प्रतेक व्यक्ति का अपना अपना दृष्टिकोण होता हैं।
मेरे दृष्टिकोण से ऊपर वर्णित जिन कारण का उल्लेख किया उसी कारण गुरुदेव ने यहाँ मंदिर का निर्माण कराया यदि इसका दूसरा पहलु देखें तो भारत में बारह ज्योतिर्लिंग है, यू तो शास्त्रों में 64 ज्योतिर्लिंगो का उल्लेख है, कुछ लोग कहते हैं ये 12 ज्योतिर्लिंग ही मुख्य हैं तो कुछ का कहना है की शेष ज्योतिर्लिंग लुप्त हो गए हैं। जितना मैं अपने गुरुदेव को जानती हूं वे एक महान योगी है और और इस मंदिर को उन्होंने 13वे ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित किया। हम सब जानते है की ज्योतिर्लिंग अर्थात ऊर्जा के प्रकाश स्तम्भ, यहाँ से सम्पूर्ण क्षेत्र को ऊर्जा से प्रकाशित कर हर प्रकार से विकसित किया जा सकता हैं।
मेरे दृष्टिकोण से ऊपर वर्णित जिन कारण का उल्लेख किया उसी कारण गुरुदेव ने यहाँ मंदिर का निर्माण कराया यदि इसका दूसरा पहलु देखें तो भारत में बारह ज्योतिर्लिंग है, यू तो शास्त्रों में 64 ज्योतिर्लिंगो का उल्लेख है, कुछ लोग कहते हैं ये 12 ज्योतिर्लिंग ही मुख्य हैं तो कुछ का कहना है की शेष ज्योतिर्लिंग लुप्त हो गए हैं। जितना मैं अपने गुरुदेव को जानती हूं वे एक महान योगी है और और इस मंदिर को उन्होंने 13वे ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित किया। हम सब जानते है की ज्योतिर्लिंग अर्थात ऊर्जा के प्रकाश स्तम्भ, यहाँ से सम्पूर्ण क्षेत्र को ऊर्जा से प्रकाशित कर हर प्रकार से विकसित किया जा सकता हैं।
अतः बाबाजी ने 13 वे ज्योतिर्लिंग को खोज उसे स्थापित कर ना सिर्फ अपने अनेक जन्मों के अनेक प्रकार के ऋण को चुकता किया बल्कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अनुग्रह प्रदान कर कल्याणकारी और परोपकार कार्य किया।
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