माया
माया एक ऐसा शब्द जिसे सरलता से समझना आसान नहीं। आत्मा मनुष्य योनि में जन्म लेती हैं, समाज और परिवार से शिक्षा ग्रहण करते हुए बढ़ती है, पढ़ती-लिखती हैं, नौकरी पाती हैं फिर शादी, परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक परिश्रम, फिर बच्चों को अच्छी परवरिश देना , पढ़ाना, उनकी शादी करना, नाति पोते हो जाएँ, उनका मुँह देख ले फिर इनके मोह में जकड़ जाना।
इस पुरी यात्रा में आत्मा यह विस्मरण कर जाती है की जिस उद्देश्य हेतु जन्म लिया वह वासानाओं, मोह, आसक्ति , अपेक्षा के जाल में फंस जाती है तथा अपना मूलस्वरुप भूल जाती हैं, यही माया हैं।
माया क्या हैं :- माया प्रतेक वह वस्तु, भावना, व्यक्ति, स्थान हैं जो आप को स्वा से प्रथक कर मात्र उसके विषय में सोचने हेतु विवश कर दें, भवर जाल में फंसा कर परम तत्व चेतना और अपने मूल से दूर ले जाये माया हैं।
धन, स्त्री - पुरुष के प्रति आकर्षण व प्रेम की भावना कुछ और नहीं माया का प्रति रूप हैं, यहाँ तक स्वामी विवेकानंद जी ने तो अपनी चर्चित कृति ज्ञान योग में तो माँ की ममता को भी माया का ही रूप बताया। इसी भवर जाल में उलझा मनुष्य स्वयं को भूल जगत के प्रपंच को सत्य मान बैठता हैं और मृत्यु और जन्म के फेरे में पड़ा रहता हैं।
उपनिषद में वर्णित एक कथा माया के स्वरूप उसके अर्थ को समझने का सरल माध्यम हैं। एक बार ऋषि नारद भगवान श्री कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचते हैं और कहते है प्रभु कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि पर आप ने अर्जुन को आत्मबोध हेतु गीता का पाठ पढ़ाया जिस से समस्त संसार लाभान्वित हुआ। किन्तु अब आप मुझ पर भी थोड़ी कृपा करें और मुझें यह बताएं की यह माया क्या हैं। भगवन बोले इस प्रश्न के उत्तर के लिए तो आप को मेरे साथ भर्मण पर चलना होगा। दोनों निकल दिए और चलते चलते कच्छ के रेगिस्तान पहुंचे, दोनों थक चुके थे इसलिय कुछ देर विश्राम करने हेतु रुके, ऋषि बोले भगवन आप ने अर्जुन को बिना किसी जिज्ञासा के आत्मज्ञान दिया और मुझें आप यहाँ रेगिस्तान में ले आये हैं। श्री कृष्ण बोले ऋषि मुझें बहुत प्यास लगी थोड़ा जल उपलब्ध कराओं फिर मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर देता हूं व प्रभु अब इस रेगिस्तान में जल कहाँ खोजू ? चलो नारद उत्तर के लिए और परिश्रम अवश्य भावी लगता हैं। इस तरह ऋषि नारद जल की खोज में निकल पड़ते हैं, चलते चलते वे एक जलाशय पर पहुंचते हैं, वह उन्हें कुछ युवतियाँ मिलती हैं उनमे से एक उनको जल पिलाती हैं, उन्हें उस युवती से पहली नजर में प्रेम हो जाता हैं, उसके विषय में अधिक जाना तो पाया की वह यहाँ के राजा की पुत्री हैं। देव ऋषि राजा के पास पहुंच कर उनसे उनकी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। राजा कहते हैं की मुझें यहाँ प्रस्ताव मंजूर हैं वस ऋषि मेरा एक निवेदन है की विवाह उपरांत आप यही रहें और मेरे उपरांत इस राज काज को संभाले।
देव ऋषि हामि भर देते हैं दोनों का विवाह होता हैं कुछ वर्ष उपरांत बच्चे और इस कार्य काल में देवऋषि पूर्णतः भोग विलास का आनंद लेते हुए जीवन व्यतीत कर रहे थे। तभी एक दिन समाचार मिलता हैं पडोसी राज्य के राजा ने हम पर आक्रमण किया है ऋषि नारद युद्ध हेतु निकल पड़ते हैं। युद्ध में मार काट के उपरांत देवऋषि के राज्य को हार का सामना करना पड़ता हैं। इस स्थिति में स्वयं व परिवार को सुरक्षित रखने के लिए वह से पलायन करते हैं। जंगल पहुंचते हैं दर दर भटकते, भोजन तक के मोहताज हो जाते हैं, बच्चे व रानी भूख से विलख रहें हैं तभी अचानक तेज वर्षा होने लगती हैं, नदी पार करने के लिए नौका का सहारा लेते है, मध्य में अत्यधिक वर्षा के कारण नौका अनियंत्रित हो जाती हैं तथा पत्नी पुत्र नदी में बह जाते हैं, ऋषि नारद जोर जोर से रोते विलखते हुए चिलाते है मेरी पत्नी व बच्चों को कोई बचाओं....!
इतने में ही श्री कृष्ण पूछते हैं क्या हुआ देवऋषि क्यों चीख रहें हैं ज़ब देवऋषि को होश आया तो उन्होंने स्वयं को भगवान के समीप महल में ही पाया और उन्हें बोध हुआ यह सब तो उनके स्वप्न सामान कल्पना मात्र थी, सत्य नहीं। भगवन बोले ऋषि नारद तुमने मुझसे पूछा माया क्या हैं, माया को शब्दों में समझया नहीं जा सकता इसलिय मैंने तुम्हे इस अनुभव के माध्यम से बोध कराया। बोध ही माया के स्वरूप को ज्ञात करने का उचित माध्यम हैं। तुमने अनुभव किया नारद किस प्रकार स्त्री के आकर्षण ने तुम्हे विवाह बंधन में बाधा, किस प्रकार तुम भोग विलास में रम गए और मुझें भी भूल गए, किस प्रकार बच्चों के मोह ने तुम्हें रोने विलखने हेतु मजबूर किया।
साधारण शब्दों में ज़ब मनुष्य मुझें भूल इस संसार को सत्य मान उसमे उलझ जाता हैं वही माया हैं, किसी के लिए यह स्त्री पुरुष का आकर्षण, किसी के लिए धन, किसी के लिए मान - सम्मान प्रतिष्ठा, किसी के लिए बच्चों का मोह। अतः यहाँ संसार ही माया है। माया कुछ और नहीं मेरी ही शक्ति का बिछाया हुआ जाल हैं, जहाँ मनुष्य उलझ जाता हैं और जो नहीं उलझता तर जाता हैं।
माया पर किस प्रकार विजय प्राप्त की जाये...
भगवान स्वयं कहते हैं चुकी माया मेरी शक्ति का प्रति रूप हैं, इसलिए इस पर विजय पाना आसान नहीं हैं किन्तु कोई मनुष्य भक्त बनकर स्वयं का सर्वस्य मुझें अर्पण कर दे तो मुक्त हो सकता हैं।
आप इसे ऐसे देखे जैसे आप अपने मित्र के घर उनसे भेट के लिए लम्बे अंतराल बाद जाते हैं, मुख्य द्वार पर ही आप का सामना घर के पालतू कुत्ते से होता हैं जो अत्यधिक उत्तेजित हैं और आप को अंदर नहीं जाने देगा, अगर आप ने प्रयास किया तो आप को काट भी सकता हैं। आप पीछे के दराबाजे से जाने का प्रयास करते हैं किन्तु वह यहाँ भी मौजूद हैं अधिक उत्तेजना के साथ। तभी आप को विचार आता हैं मित्र को पूकारना अधिक उचित होगा, आप मित्र को अवाज देते हैं और कुत्ते को संभालने के लिए बोलते हैं। मित्र बाहर आता हैं अपने कुत्ते को शांत करता है और कुत्ते व अपने मित्र का परिचय करवाता हैं। कुत्ता शांत हो जाता है तथा मित्र को घर में प्रवेश करने देता हैं। बस इस कहानी के अनुरूप ही हमें भी ईश्वर को पूकारना होगा वही अपनी माया रूपी शक्ति को शांत कर उस तक पहुंचने का मार्ग बना सकते है। अतः माया पर जीत तभी संभव है ज़ब ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण होगा एवं समर्पण भाव जाग्रत करने हेतु साधना आवश्यक हैं।
इस पुरी यात्रा में आत्मा यह विस्मरण कर जाती है की जिस उद्देश्य हेतु जन्म लिया वह वासानाओं, मोह, आसक्ति , अपेक्षा के जाल में फंस जाती है तथा अपना मूलस्वरुप भूल जाती हैं, यही माया हैं।
माया क्या हैं :- माया प्रतेक वह वस्तु, भावना, व्यक्ति, स्थान हैं जो आप को स्वा से प्रथक कर मात्र उसके विषय में सोचने हेतु विवश कर दें, भवर जाल में फंसा कर परम तत्व चेतना और अपने मूल से दूर ले जाये माया हैं।
धन, स्त्री - पुरुष के प्रति आकर्षण व प्रेम की भावना कुछ और नहीं माया का प्रति रूप हैं, यहाँ तक स्वामी विवेकानंद जी ने तो अपनी चर्चित कृति ज्ञान योग में तो माँ की ममता को भी माया का ही रूप बताया। इसी भवर जाल में उलझा मनुष्य स्वयं को भूल जगत के प्रपंच को सत्य मान बैठता हैं और मृत्यु और जन्म के फेरे में पड़ा रहता हैं।
उपनिषद में वर्णित एक कथा माया के स्वरूप उसके अर्थ को समझने का सरल माध्यम हैं। एक बार ऋषि नारद भगवान श्री कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचते हैं और कहते है प्रभु कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि पर आप ने अर्जुन को आत्मबोध हेतु गीता का पाठ पढ़ाया जिस से समस्त संसार लाभान्वित हुआ। किन्तु अब आप मुझ पर भी थोड़ी कृपा करें और मुझें यह बताएं की यह माया क्या हैं। भगवन बोले इस प्रश्न के उत्तर के लिए तो आप को मेरे साथ भर्मण पर चलना होगा। दोनों निकल दिए और चलते चलते कच्छ के रेगिस्तान पहुंचे, दोनों थक चुके थे इसलिय कुछ देर विश्राम करने हेतु रुके, ऋषि बोले भगवन आप ने अर्जुन को बिना किसी जिज्ञासा के आत्मज्ञान दिया और मुझें आप यहाँ रेगिस्तान में ले आये हैं। श्री कृष्ण बोले ऋषि मुझें बहुत प्यास लगी थोड़ा जल उपलब्ध कराओं फिर मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर देता हूं व प्रभु अब इस रेगिस्तान में जल कहाँ खोजू ? चलो नारद उत्तर के लिए और परिश्रम अवश्य भावी लगता हैं। इस तरह ऋषि नारद जल की खोज में निकल पड़ते हैं, चलते चलते वे एक जलाशय पर पहुंचते हैं, वह उन्हें कुछ युवतियाँ मिलती हैं उनमे से एक उनको जल पिलाती हैं, उन्हें उस युवती से पहली नजर में प्रेम हो जाता हैं, उसके विषय में अधिक जाना तो पाया की वह यहाँ के राजा की पुत्री हैं। देव ऋषि राजा के पास पहुंच कर उनसे उनकी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। राजा कहते हैं की मुझें यहाँ प्रस्ताव मंजूर हैं वस ऋषि मेरा एक निवेदन है की विवाह उपरांत आप यही रहें और मेरे उपरांत इस राज काज को संभाले।
देव ऋषि हामि भर देते हैं दोनों का विवाह होता हैं कुछ वर्ष उपरांत बच्चे और इस कार्य काल में देवऋषि पूर्णतः भोग विलास का आनंद लेते हुए जीवन व्यतीत कर रहे थे। तभी एक दिन समाचार मिलता हैं पडोसी राज्य के राजा ने हम पर आक्रमण किया है ऋषि नारद युद्ध हेतु निकल पड़ते हैं। युद्ध में मार काट के उपरांत देवऋषि के राज्य को हार का सामना करना पड़ता हैं। इस स्थिति में स्वयं व परिवार को सुरक्षित रखने के लिए वह से पलायन करते हैं। जंगल पहुंचते हैं दर दर भटकते, भोजन तक के मोहताज हो जाते हैं, बच्चे व रानी भूख से विलख रहें हैं तभी अचानक तेज वर्षा होने लगती हैं, नदी पार करने के लिए नौका का सहारा लेते है, मध्य में अत्यधिक वर्षा के कारण नौका अनियंत्रित हो जाती हैं तथा पत्नी पुत्र नदी में बह जाते हैं, ऋषि नारद जोर जोर से रोते विलखते हुए चिलाते है मेरी पत्नी व बच्चों को कोई बचाओं....!
इतने में ही श्री कृष्ण पूछते हैं क्या हुआ देवऋषि क्यों चीख रहें हैं ज़ब देवऋषि को होश आया तो उन्होंने स्वयं को भगवान के समीप महल में ही पाया और उन्हें बोध हुआ यह सब तो उनके स्वप्न सामान कल्पना मात्र थी, सत्य नहीं। भगवन बोले ऋषि नारद तुमने मुझसे पूछा माया क्या हैं, माया को शब्दों में समझया नहीं जा सकता इसलिय मैंने तुम्हे इस अनुभव के माध्यम से बोध कराया। बोध ही माया के स्वरूप को ज्ञात करने का उचित माध्यम हैं। तुमने अनुभव किया नारद किस प्रकार स्त्री के आकर्षण ने तुम्हे विवाह बंधन में बाधा, किस प्रकार तुम भोग विलास में रम गए और मुझें भी भूल गए, किस प्रकार बच्चों के मोह ने तुम्हें रोने विलखने हेतु मजबूर किया।
साधारण शब्दों में ज़ब मनुष्य मुझें भूल इस संसार को सत्य मान उसमे उलझ जाता हैं वही माया हैं, किसी के लिए यह स्त्री पुरुष का आकर्षण, किसी के लिए धन, किसी के लिए मान - सम्मान प्रतिष्ठा, किसी के लिए बच्चों का मोह। अतः यहाँ संसार ही माया है। माया कुछ और नहीं मेरी ही शक्ति का बिछाया हुआ जाल हैं, जहाँ मनुष्य उलझ जाता हैं और जो नहीं उलझता तर जाता हैं।
माया पर किस प्रकार विजय प्राप्त की जाये...
भगवान स्वयं कहते हैं चुकी माया मेरी शक्ति का प्रति रूप हैं, इसलिए इस पर विजय पाना आसान नहीं हैं किन्तु कोई मनुष्य भक्त बनकर स्वयं का सर्वस्य मुझें अर्पण कर दे तो मुक्त हो सकता हैं।
आप इसे ऐसे देखे जैसे आप अपने मित्र के घर उनसे भेट के लिए लम्बे अंतराल बाद जाते हैं, मुख्य द्वार पर ही आप का सामना घर के पालतू कुत्ते से होता हैं जो अत्यधिक उत्तेजित हैं और आप को अंदर नहीं जाने देगा, अगर आप ने प्रयास किया तो आप को काट भी सकता हैं। आप पीछे के दराबाजे से जाने का प्रयास करते हैं किन्तु वह यहाँ भी मौजूद हैं अधिक उत्तेजना के साथ। तभी आप को विचार आता हैं मित्र को पूकारना अधिक उचित होगा, आप मित्र को अवाज देते हैं और कुत्ते को संभालने के लिए बोलते हैं। मित्र बाहर आता हैं अपने कुत्ते को शांत करता है और कुत्ते व अपने मित्र का परिचय करवाता हैं। कुत्ता शांत हो जाता है तथा मित्र को घर में प्रवेश करने देता हैं। बस इस कहानी के अनुरूप ही हमें भी ईश्वर को पूकारना होगा वही अपनी माया रूपी शक्ति को शांत कर उस तक पहुंचने का मार्ग बना सकते है। अतः माया पर जीत तभी संभव है ज़ब ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण होगा एवं समर्पण भाव जाग्रत करने हेतु साधना आवश्यक हैं।
बहुत उत्तम अभिव्यक्ति
ReplyDeleteलेख प्रेरणा दायक है। जीवन का मूल्य समझना ही जीवन जीने की कला है और अपने अभिष्ट को पाना है।
ReplyDeleteधन्यवाद। जय श्री राधे राधे कृष्णा जी ।