मंत्र शक्ति

किसी भी संप्रदाय में मंत्र शक्ति के महत्व को देखा गया है। क्रिश्चन, बौद्ध, मुस्लिम, जैन या सिख प्रतेक सम्प्रदाय के अनुयायि मंत्र का उच्चारण ईश्वर व सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए करते आये है। किन्तु सनातन धर्म में मंत्रो का प्रयोगआदिकाल से होता आया है। मंत्र क्या है ? किस प्रकार कार्य  करते है ? इनका क्या महत्व है ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर हम इस लेख में खोजने का प्रयास करेंगे। आज इस कलयुग में मंत्रो के विषय में जानना अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर युवाओं को ज़ो अपनी संस्कृति और जड़ों से दूर होते जा रहे है, पुनः जुड़ सके।

मंत्र क्या है ?
मंत्र का शाब्दिक अर्थ है मन को साधकर एक विशिष्ट ऊर्जा के आव्हान द्वार ईश्वर के समीप पहुंचना, उसे जानना। कुछ मंत्र है ज़ो सांसारिक कामनाओं से परे है तो अन्य मंत्र सांसारिक कामनाओं की पूर्ति के लिए किये जाते हो। कामनायें ज़ो भी हो किन्तु मन को साधे बिना मंत्र का उचित फल नहीं प्राप्त किया जा सकता, इसलिए मन को साधने हेतु जिन विशिष्ट ध्वनियों का उपयोग किया जाता है वह 'मंत्र' कहलाती है।

मंत्र शक्ति किस प्रकार कार्य करती है... ?

मंत्र शक्ति किस प्रकार कार्य करती है, इस हेतु हमें सृष्टि के उत्तपति के समय उत्पन्न हुई प्रथम ध्वनि 'ओम' से आरंभ करना होगा। 'ओम' स्वयं में महामंत्र है, प्रणव मंत्र है अर्थता प्रत्येक मंत्र की पूर्णतः तभी सिद्ध होती है जब इसके आरंभ में 'ओम' होता है। 'ओम' प्रणव मंत्र भी है और बीज मंत्र भी, जैसे "ॐ नमः शिवाय ", "ॐ नमो: भगवते वाशुदेव" इत्यादि । ॐ के उदाहरण से ही हम जान पायेगें मंत्र किस प्रकार कार्य करते है। ॐ स्वंय में पूर्ण है, यह पूर्ण शब्द भी है और वाक्य भी। ॐ तीन अक्षरों का समूह है। जिसमें समस्त सृष्टि का सार समाया है। ये तीन अक्षर- 'अ' , 'ऊ', 'म'। इन तीनों का मेल ओम ध्वनि है। 'अ' का अर्थ है- उत्पत्ति । 'ऊ' का अर्थ है - विस्तार और 'म' का अर्थ है - विलय । इस प्रकार सृष्टि सांसर में परिलक्षित हो रही प्रत्येक सूक्षम से स्थूल और विराट तक की पहले उत्पत्ति फिर विस्तार और अंत में विलय । विलय अर्थात समाप्त नहीं वरन जहाँ से बिन्दु का आंरभ हुआ उसी में लीन या एक होना। इस प्रकार हमनें देखा छोटा सा दिखने और उच्चारित होने वाले ओम के विस्तार स्वरूप को, तात्पर्य 'ओम' में ही समस्त सृष्टि का विस्तार और विलय है।

यू तो समस्त ब्राह्मण्ड में अंनत ध्वनियाँ प्रति पल और क्षण उत्पन्न होती है और हो रही है। यदि ध्यान से स्वंम का अवलोकन करे तो मनुष्य शरीर के भीतर भी निरंतर ध्वनियों को आप सुन सकते । मंत्र भी कुछ और नहीं शब्दों और अक्षरों के मेल से उत्पन्न हुई सकारात्मक ध्वनि है। जो उच्चारित करने वाले मनुष्य के भीतर वातावरण को शुद्ध करती हुई उसके आस पास के वातावरण के साथ समस्त ब्रह्माण्ड को शुद्ध और चेतन करने का काम करती है।
मंत्र विशेष अक्षरों के मेल से बना होता है जिनकी विशेष ध्वनि उस विशेष शक्ति या ऊर्जा को आकृषित कर आपके इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायक होती है। उदाहरण शब्दों में बड़ी ऊर्जा होती है, नकारात्मक ध्वनि से उत्पन्न हुए अक्षर, शब्द और वाक्य नकारात्मकता का कारण है। आज मंत्रों , श्लोक , और सूत्र के उच्चारण में कमी या विलोपता के कारण वातावरण नकारात्मक ध्वनि का समूह हो गया है। इसकी मुख्य वजह है अपने मूल्यों, शिक्षा से दूर होना । अभ्रद शब्द जैसे व्यक्ति सूचक गलियाँ, हिंसक शब्द इत्यादि नकारात्मक ध्वनियों के उदाहरण है।

मंत्र उच्चारण का महत्व...
बाबाजी ( ब्रह्मलीन महायोगी पयालट बाबाजी ' मेरे गुरुदेव ) कहा करते थे की बेटा जब हम किसी विशेष मंत्र का उच्चारण करते है तो उस दौरान उस मंत्र उच्चारण से जागृत हुई विस्तृत उर्जा से स्वाभाविक ही जुड़ जाते है। अर्थता उस मंत्र का उच्चारण सृष्टि में जहां भी हो रहा होगा आप उसके साथ एक होकर स्वयं से लेकर सृष्टि के कल्याण में स्वतः ही अपनी भूमिका निभायगे । मंत्र के अन्य लाभों के साथ व्यर्थ के चल रहे विचारों में नष्ट हो रही ऊर्जा को सुरक्षित कर दिशा दि जा सकती है।
स्वयं से लेकर वातावरण व ब्रह्माण्ड में शुद्धि हेतु मंत्र जप एक उचित माध्यम है। यदि प्रत्येक व्यक्ति कुछ समय नित्य जप करे तो वह स्वंय से लेकर विशुद्घ हो रहे वातावरण को शुद्ध करने में अपना योगदान देकर जीवन की सर्थकता को सिद्ध करने की ओर बढ़ सकता है।

साधना के लिए उचित पद्धति...

गुरुदेव कहते है बेटा साधना के अंतर्गत मंत्र साधना ऐसी पद्धति है जिसे हर परिस्थिति में किया जा सकता है। मंत्र सकारात्मक ध्वनियों की अद्भूत भेट है। हमारे श्रृषि मुनियों और सनातन धर्म की, अतः सभी इस साधना पद्धति को अपनाकर संसार से लेकर ब्राहण्ड के रहस्यों को प्रकट कर सकते है।










Comments

Popular posts from this blog

मन व उसके आयाम...

अष्टांग योग साधना (धारणा, ध्यान, समाधि )

शिक्षा