शिव का स्वरुप

अक्सर अपने सवालों के उत्तर खोजने के लिए मैं प्रत्यनशील रहती, कभी किसी माध्यम से कभी किसी,अधिकांश आतंरिकता से निकले उत्तर मेरे जबाब रहते। उत्तर वही जो आपको स्तुष्ट कर दें। सोसल मिडिया साइट पर आध्यात्म से संबधित पुस्तक लेख खोजती रहती हूँ।

एक लेख में मैनें पड़ा परमात्मा का कोई रूप नहीं जहाँ के जैसे निवासी उसी प्रकार की वेश-भूषा के साथ वे अपने परमात्मा की कल्पना करते है। जैसे हम मनुष्य है तो परमात्मा को मनुष्य के रूप में देखत है। फिर जैसा देश वैसा परमात्मा का वेश । हम भारत वासियों के परमात्मा परम्पारिक परिधानों और आभूषणों से सुशजित होते है। शिर्ष पर मुकुट, कानों में कुन्डल, लम्बे केश, शिल्क के परिधान, सुन्दर नैन नक्श आदि।
तो यदि हम ग्रीक या अन्य देशों के देवी देवाताओं पर नजर डाले तो उनके देवी देवताओं का रुप और परिधान वहाँ की संस्कृति के अनुरूप होता है। इसी परिपेक्ष में कल ही मैंने स्वामी शिवानंद जी की पुस्तक ' ईश्वर ' में भी इसी प्रकार परमात्मा के रूप के विषय में व्याख्या पड़ी।उन्होंने लिखा हम मनुष्य अत्यंत सीमित है। जैसे हम हैं और हमारे लिए जो सर्वोत्म चरित्र, आचरण, परिधान और रुप है , उस दृष्टि से हमने अपने ईश्वर की परिकल्पना को मूर्तरूप दिया। किंतु नहीं ईश्वर सीमाओं से परे रूप,चरित्र और आचरण से विलग है। यह सब तो मनुष्य के मन की कल्पना है।
रात्रि इन्ही प्रश्नों को साथ लेकर सोइ, प्रातः ज़ब उठी तो सुबह की चाय के साथ टेबल पर रखी पुस्तक एवं उसमें चित्रित शिवजी के छाया चित्र को देख मैं थोड़ा विचार में पड़ गई और पुनः एक और प्रश्न मन पटल पर उठ खाड़ा हुआ। सभी देवी देवता अंत्यत सुंदर परिधान और रुप के साथ चित्रित होते है, किंतु भगवान शिव का रूप तो सर्वदा पृथक है। इसे देख लगता है यह मनुष्य के मन की कल्पना नहीं वरन मनुष्य इस रूप में प्रतीकों को माध्यम बना सृष्टि के गुण रहस्यों को प्रकट करना चाहते है।
जैसे शीर्ष पर जटाएँ, मस्तष्क पर अर्ध चंद्र, माथे पर त्रिगुट तिलक उसके माध्य में तीसरा नेत्र, कण्ठ में वासुकी, नंदी की सवारी, शरीर पर भस्म का लेप, आभूषण के नाम पर रुद्राक्ष की माला, हाथों में त्रिशूल, वाड यंत्र के नाम पर डमरू विचित्र । यह मनुष्य के मन की कल्पना नहीं क्योंकि मनुष्य का मन ऐसी कल्पना से परे है। यह तो सर्वथा विपरित है। तो क्या है इस स्वरूप का वास्तविक अर्थ और रहस्य ? अन्य देवी देवाताओं से पृथक् शिव का रूप आध्यात्म से जुड़ें अनसुलझें प्रश्नों को खोलता है जैसे -

चंद्रमा - हम सब जानते है मन का स्वामी चंद्रमा है , यदी चंचल मन को साधना है, तो पहले चंद्रमा को साधना होगा। एवं जिस ऊर्जा ने स्वयं चंद्र को साधा है वह शिव है।
त्रिसूल और त्रिगुट - महादेव के मस्तिषक पर त्रिगुट और उनका अस्त्र त्रिसूल दोनों प्रकृति के तीन गुण सत्, रज, तम को निरुपित करते है ।

तीसरा नेत्र - त्रिगुट के मध्य स्थित तीसरा नेत्र मनुष्य की उस छठी इन्द्री का प्रतीक है, जिसके माध्यम से संसार के परे वास्तविक सत्य को जाना जा सकता है।

नंदी की सवारी - नंदी भगवान शिव के द्वारपाल है। वे शक्ति ,कर्मठता, स्थिरता, प्रतीक्षा , धैर्य , बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक है। यदि आप शिवत्व को प्राप्त करना चाहते है तो आप को नंदी के इन गुणों को स्वंय में समाहित करना होगा ।
भस्म - भगवान शिव के शरीर पर लेपित भस्म जीवन की नश्वरता को दशार्ती है, एक दिन इसी भस्म की तरह इस भौतिक देह को मिट्टी में विलीन हो जाना है ।

रुद्राक्ष - रुद्राक्ष एक बीज है और एक बीज उत्पत्ति से पूर्व और अंत की सामान्यतः को दर्शाता है।

डमरू - डमरू ब्राहण्ड का प्रतीक है। शिवजी के डमरू को नाद साधना का आंरभ कहा गया है। नाद तात्पर्य वह ध्वनि जिसे ओम कहा गया , इसकी उत्पति डमरू से ही  मानी जाती है। ओम में ही सृष्टि का सार है।

कण्ठ में वासुकी -भगवान शिव और वासुकी का संबंध अंतर्निहित ऊर्जाओं को संरक्षित करने और नियंत्रित करने के महत्व पर जोर देता है ।

हमने देखा सनातन सनातन धर्म में शिव के रूप को बड़ी सुंदरता के साथ वर्णन किया, इस रूप की वैज्ञानिकता को समझ कर शिवत्व और अधिक हमें अपनी ओर आकर्षित करते है।




















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