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मैं कौन हूँ ....

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  जब आप अध्यात्मिक मार्ग की यात्रा करते हुए या फिर अध्यात्म को समझना चाहते हैं, तो जो प्रश्न सबसे पहले हमारे भीतर से ही आवाज देता है... वह है मैं कौन हूं ?? क्या मैं वास्तव में एक शरीर मात्र हूं या शरीर से हटकर भी कुछ और मेरा वास्तविक स्वरूप है, इस शरीर के बोध के कारण ही मैं इस संसार रूपी माया में उलझा रहता हूं। बार-बार यह प्रश्न मेरे मन में आकर मुझे भीतर से झंझोर देता है जब तक मनुष्य इस प्रश्न का उत्तर नहीं खोज लेता तब तक उसकी आध्यात्मिक यात्रा अधूरी है। जगतगुरू आदि शंकराचार्य से उनके पूज्य गुरुदेव जी गोविंद पाद ने पूछा कि तुम कौन हो? तो उत्तर जो दिया इसे आज हम निर्वाण षटकम् के माध्यम से जानते हैं... न मन हूं न बुद्धि न चित्त अहंकार.... "मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ यह एक ऐसा प्रश्न है जिसके बोध मात्र से मनुष्य योनि के गंतव्य को प्राप्त हुआ जा सकता है, एवं मनुष्य योनि से तरा जा सकता है। जब भी यह प्रश्न आप किसी व्यक्ति से करते हैं कि आप कौन हैं, तो अमुक व्यक्ति अपना परिचय अपने न...

भारत के संविधान पर वार

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26 जनवरी 1950 भारत गणतंत्र हुआ... एक लंबे संघर्ष तथा हमारे पूर्वजों के अथक और दृढ़ प्रयासों से भारत ने अपने संविधान का निर्माण कर उसे स्थापित किया और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप मैं भारत विश्व पटल पर उभरा और इन 71 वर्षों मैं भारत एक मजबूत लोकतंत्र के रूप मैं पुरे विश्व मैं स्थापित हुआ... हमारे पूर्वजों के प्रयासो से हमने हज़ारो वर्षों के लंबे संघर्ष के पश्चात स्वतंत्रता को प्राप्त किया इसी का परिणाम हैं की हम आज एक आजाद भारत मैं रेह कर अपने विचारों को स्वतंत्रता पूर्वक रख और व्यक्त कर सकते हैं.... किन्तु आजादी के 72 वे गणतंत्र पर जो देश मैं हुआ उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती... ये किसान आंदोलन के रूप मैं देश के लोकतंत्र को चुनौती हैं तभी इन्होंने गणतंत्र दिवस का दिन चुना, लाल किले पर एक विशेष सम्प्रदाय व संघठन का पताका लेहराना संविधान को ख़तम करने के प्रयास हैं... ये लोग ना सांसद ना न्यायालय और ना मीडिया को महत्व दे रहे हैं और कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका व प्रेस ही संविधान के चार सतम्भ हैं जिनको ये लोग नकार चुके हैं... तो कौन हैं ये लोग जो किसानों के रूप मैं देश से लोकतंत...

इच्छाओं का होना स्वाभाविक... 

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 ऐसा कहाँ जाता हैं की मनुष्य की इच्छाएं ही दुख का  प्रमुख  कारण हैं... विभिन्न सम्प्र्दयो चाहे जैन धर्म हो य बौद्ध धर्म तृष्णा के त्याग को ही सुख का मार्ग व मोक्ष प्राप्ति का माध्यम माना गया हैं... परन्तु वास्तव मैं मनुष्य जीवन मैं    इच्छाओं का त्याग संभव हैं?. .. इसका उत्तर है नहीं।  मेरे गुरुदेव कहते हैं की इच्छाओं को त्यागो मत उन्हें दिशा दो... ताकि वे भौतिक वाद मैं जकड़ कर महत्वकांक्षी ना हो... ज़ब व्यक्ति सांसारिक माया जाल मैं फस कर अशक्त हो कर इच्छा की चाहा रखता, उस का त्याग ही तृष्णाओं का वास्तविक त्याग हैं... भारतीय शास्त्रों मैं इन्हें वासनायेें भी कहाँ गया हैं... ये तीन प्रकार की हैं -: 1. लोक वासना 2. शास्त्र वासना 3. शरीर वासना    इन्हीं वासनाओें के इर्द- गिर्द ही मनुष्य का जीवन घूमता हैं... लोक वासना इस लोक मैं अच्छे कर्म करके दूसरे लोक मैं स्वर्ग की कामना लोक वासना हैं। शास्त्र वासना से तात्पर्य.. शास्त्रों का ज्ञान पाकर अत्यंत श्रेष्ठ होने की महत्वाकांक्षा। शरीर वासना मैं शरीर के प्रति मोह व शरीर सदा ऐसा ही बना रहे इसकी...

वेराग्य और अनासक्ति.....

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 ईश्वर ने जब इस जगत की रचना की तो इस सृष्टि की संकल्पना को पूर्ण करने हेतु योनियों का सृजन किया। भारतीय शास्त्रों के अनुसार इस सृष्टि पर 8400000 योनियों है, इन सभी योनियों से होकर मनुष्य को मुक्ति (मोक्ष )की प्राप्ति होती है।  इनमें से मनुष्य योनि को सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि एकमात्र मनुष्य योनि के द्वारा ही जीव अपने अंतिम गंतव्य मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। शास्त्रों का कथन हैं कि मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मनुष्य जीवन से ही होकर गुजरता है, क्योंकि एक मात्र मनुष्य को ईश्वर ने 'विवेक' दिया है..... विवेक के माध्यम से ही उसके मोक्ष के द्वार खुलते हैं। शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति के चार साधनों का वर्णन है.... " नित्यानित्यवस्तुविवेक:। इहामुत्रार्थफलभोगविराग :।शमादिषट्क सम्पति :मुमुक्षत्वं चेति। " नित्य अनित्य वस्तु विवेक इस और परलोक के भोग से वैराग्य, शमादि छ : संपत्ति और मुमुक्षा है। गुरु आदि शंकराचार्य ने इसका विस्तार से वर्णन अपनी पुस्तक "विवेक चूड़ामणि "में किया है। मोक्ष की प्राप्ति हेतु ...

विश्व मैं मानव के डगमागते कदमों का एक मात्र सहारा आध्यात्म....

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            "जिसका प्रकार प्राण के बगैर शरीर निर्जीव है, उसी प्रकार धर्म,  अध्यात्म, आस्था,  भक्ति, योग व तत्वज्ञान के बगैर यह जगत अस्तित्वहीन है"        मौजूदा दौर में विश्व भर में मानव के पग  सत्य की विपरीत दिशा में काफी तीव्र गति से बड़े हैं,  इसके घातक परिणाम वर्तमान मैं परिलक्षित हो रहे हैं... ऐसे में बिना विलंब किए हुए सत्य के मार्ग पर पुनः लौटना अत्यंत आवश्यक है.. सत्य का बोध एवं सत्य के मार्ग की ओर अग्रसर करने वाला एकमात्र साधन अध्यात्म है...  हमारे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीवन क्या है, हमारा इस मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है इस बात की अनुभूती ही अध्यात्मिक व्यवहार और इश्वर को अनुभव करने का मार्ग है.          हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही ऋषि,  मुनियों, आचार्य व महान संतों ने सदैव इस बात का समर्थन किया की ... इस सत्य का ज्ञान अध्यात्म से होकर ही गुजरता है. जीवन के  वास्तविक ज्ञान की अनुभूति हेतु ऋषि मुनियों ने विभिन्न मार्ग बताएं जिनमें प्रमुख हैं योग, ध्या...

विश्व शांति हेतु यज्ञ की महत्वता....

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भारतीय दर्शनशास्त्र तथा धार्मिक ग्रंथो मैं यज्ञ की प्रक्रिया को विश्व मैं शांति स्थापित करने का प्रमुख साधन माना गया हैं...              यज्ञ एक प्रकार का एक विज्ञान हैं, जिस प्रकार अमुक स्वर -विन्यास से युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग -रागनियां बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है......उसी प्रकार यज्ञ के दौरान ब्रम्हांड की समस्त शक्तिओ का आवाहन  कर.. मंत्रउच्चारण के साथ उत्पन्न हुई विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगो का प्रभाव  विश्वव्यापी प्रकृति, सूक्ष्म जगत तथा प्राणियों के स्थूल और सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता हैं... तथा ये शक्ति और ध्वनि आकाश मैं व्याप्त हो कर लोगों के अंतकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती हैं...       ऋषियों ने "अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः" (अथर्ववेद 9.15.14) कहकर यज्ञ को संसार की सृष्टि का आधार बिंदु कहा है।    यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का सत्य प्रयोजन तथा वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए संगठित करना भी है. आज मानव अनेकों प्रकार से अशा...

कोरोना वायरस आखिर किस का परिणाम....

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       विश्व में आज भय का पर्यायवाची कोरोना वायरस के रूप मैं सामने आया है. विश्व के समक्ष कई चुनोतिया और समस्याएं है...उनमे से दो सबसे बड़ी समस्याएं आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन है, दोनों ही समस्याएं मानव जगत के भविष्य पर प्रश्नचिह्न उठाती है।                वर्तमान समस्या कोरोना वायरस के बारे मैं बात करे तो कोरोना वायरस ऊपर वर्णित दोनों समस्याओं को पीछे छोड़ते हुए आज विश्व और मानव जगत के लिए सबसे बड़ी समस्या के रूप मैं उभरी है... यदि गौर से इस समस्या को देखा जाये तो यहां समस्या ऊपर वर्णित दोनों समस्याओं मैं से किसी एक से उभरी है।      या तो कोरोना आतंक, भय, और अपना वर्चस्व स्थापित करने हेतु एक जैविक हथियार है या फिर विश्व मैं मानव द्वारा प्रकर्ति के शोषण का परिणाम. कुछ तथ्य और जानकारी के आधार पर हम इन दोनों समस्याओं को समझने व उनसे उभरी कोरोना वायरस की संभावनाओ पर नजर डालते है।             सर्वप्रथम आतंक, और वर्चस्व के लिए यह एक जैविक हथियार के रूप में होने की संभावना को नकारा नहीं ...

भारत को शिखर पर पहुंचाने हेतु एकता की पहल आवश्यक...

18वी सदी का अंत व 19वी सदी का आरम्भ देश में पुनर्जागरण का रहा. भारत माता गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई थी व घोर अंधकार पूरे देश में व्याप्त था. अनेक सामाजिक कुरीतियों ने देश में पैर पसार लिए थे तथा भारतीय अपने धर्म, संस्कृति और सभ्यता को लगभग भूल चुके थे. यह वह समय था जब देश पर  घनघोर काले बादल छाए थे आशा की कोई किरण दूर-दूर तक नहीं थी.                उस विपरीत समय पर भारत ने उठने के लिए कदम बढ़ाए और सामाजिक कुरीतियों तथा ब्रिटिश अत्याचारों से लड़ते हुए, देश को इस स्थिति से बाहर निकाला, यही काल इतिहास में भारतीय पुनर्जागरण के नाम से जाना जाता है. भारत को इस स्थिति से बाहर लाने में हमारे सामाजिक एवं धर्म सुधारकों की भूमिका अति महत्वपूर्ण थी, जिसमें प्रमुख थे राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद इत्यादि.               इन सुधार को ने विधवा विवाह,  बाल विवाह,  दलितों के अधिकारों, नारी शिक्षा की ओर विशेष धयान दिया जिसमे प्रमुख थे राजा राममोहन राय, ईश्व...

भारत मैं वर्तमान स्थिति के पीछे चाइना...

भारत एक समृद्ध साली संस्कृति और विरासत का देश है, इसका विस्तृत इतिहास, वैदिक ज्ञान व अध्यात्मिक गुण इसे विश्व मैं अलग स्थान दिलाते हैं. किंतु आज वर्तमान में देश मैं  राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कारण माहौल चिंताजनक है.कारण क्या है....             इसे जानने से पूर्व हम थोड़ा पीछे भारत की राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति पर नजर डालनी होगी. 1947 में आजादी प्राप्त करने के बावजूद भारत कई समस्याओं में जकड़ा रहा जिसमें कई सामाजिक कुरीतियां जैसे तीन तलाक,  दहेज प्रथा, बाल विवाह, शिक्षा,  स्वास्थ्य,  स्वच्छता से जुड़ी समस्या शामिल है. राजनीतिक समस्याओं में अनुच्छेद 370,  35a, नागरिक संशोधन अधिनियम, एनआरसी, राम मंदिर विवाद व समान नागरिक संहिता जैसी समस्याएं शामिल रही. आर्थिक समस्याओं में बेरोजगारी,  जनसंख्या नियंत्रण और असमानता व गरीबी इत्यादि है.               इन्हीं समस्याओं के कारण भारत की विकास की गति बेहद मंद रही. जिसे मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में आते ही सुलझाने जाने का बीड़ा उठा...

कांग्रेस का अब तक का शासन काल भारत का दुर्भाग्य था..

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स. प्र. ग सरकार ने वर्ष 2004से 2014 तक भारत पर 10 वर्षो तक शासन किया. अप्रत्यछ रूप से श्रीमती सोनिया गाँधी सत्ता मैं थी इसमे कोई संदेह नहीं है. इन 10 वर्षो की बात की जाये या कांग्रेस के अब तक के शासन की, क्या आप सहमत है की भारत को जिस तीव्र गति से विकास करना था वहा हुआ. हम ये नहीं कहते की अब तक कोई विकास नहीं हुआ किन्तु इस विकास की चाल अत्यंत मंद एवं कछुए की चाल की भांति थी.                                                इसके पीछे के कारणों को जानने हेतु हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा. कांग्रेस नाम के दल की स्थापना 28 दिसम्बर 1885 को की गई थी, परन्तु इसका प्रारंभिक स्वरुप दबाब समूह के रूप मे था ना की राजनैतिक दल के रूप मे. इसकी स्थापना के पीछे का मुख्य कारण था 1857 के विद्रोह के पश्चात उभरी राष्ट्रीयता की भावना को समाप्त करना एवं देश की आजादी के आक्रोष की...