Posts

कर्म, प्रारब्ध, संस्कार व नियति...

Image
 "प्रारब्ध और संस्कारों के अनुकूल भोग करता जीवन, नए संस्कारों की नींव डालता जाता है परंतु वह करता कुछ नहीं, सब कुछ एक महान शक्ति के गुरुत्वाकर्षण में होता रहता है। मनुष्य तो कर्मानुकूल संस्कारों द्वारा निर्मित एक खिलौना मात्र है। "                                                                                                           (महायोगी पायलट बाबा )                                                                                                        {...

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या हैं....??

Image
आ ज मनुष्य अत्यंत व्यस्त है, उसके पास स्वयं के लिए भी समय नहीं बस भागा जा रहा है... भागा जा रहा है, यह भाग भरा जीवन किस हेतु , किसी को पैसा चाहिए, किसी को मान -सम्मान, कोई उच्च पद पर आसीन होना चाहता है, किसी को सुख की अभिलाषा हैं। इस व्यस्त भरे जीवन में कोई राजनेता बनना चाहता है, तो कोई समाज सेवक, कोई कलाकार तो कोई वैज्ञानिक बन विज्ञान के विभिन्न अनसुलझें प्रश्नों की खोज में लगा है, कोई डॉक्टर बन काम कर रहा हैं, तो कोई सिपाही बन देश की सुरक्षा हेतु सीमाओं पर तैनात हैं। यदि किसी व्यक्ति से आप पूछों की तुम्हारें जीवन का ध्येय क्या हैं तो ऊपर वर्णित विभिन्न क्षेत्रों में से एक उस व्यक्ति का लक्ष्य भी होगा। तो इस प्रकार व्यक्ति /मनुष्य जीवन का एक मात्र ध्येय इस भौतिक जगत में अपनी अपनी इच्छाओं के अनुरूप इस सांसारिक विषयों को पाना ही क्या उसका अंतिम लक्ष्य हैं..? क्या इस सांसारिक क्षणभंगुर सुख को पाकर या उच्च पद पर आसीन हो या फिर अरबपति बन वह उस परम शांति, आनंद या पूर्ण स्थायीत्व को प्राप्त कर सकता है जो शाश्वत हैं, चिर स्थाई हैं। इसी स्थाईत्व व आनंद को पाने हेतु जाने अनजाने वह अपने लक्ष्य क...

अहंकार विभिन्न समस्याओं का कारण....

Image
आज वर्तमान में जो भी समस्याएं हमें चारों ओर परिलक्षित होती दिखती हैं, वे कहीं ना कहीं अहंकार का ही परिणाम है। ये समस्याएं व्यक्तिगत स्तर से आरंभ हो वैश्विक स्तर तक मौजूद है... व्यक्तिगत स्तर पर अहंकार व्यक्ति के जीवन को समूल रूप से नष्ट कर देता है, पारिवारिक स्तर पर अहंकार के कारण परिवार विघटन, विवाह विच्छेद जैसे प्रकरण आजकल सामान्य है, सामाजिक स्तर पर भेदभाव की नीति, जातिवाद, महिलाओं को सामान्य अधिकार प्राप्त ना होना अहंकार का ही नतीजा है, राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र से अधिक स्वार्थ को महत्व देना.. राष्ट्र धर्म का पालन ना कर स्वार्थ सिद्धि के लिए कार्य करना भी अहंकार का ही रूप है, वैश्विक स्तर पर एक देश द्वारा अन्य देशों पर वर्चस्व कायम कर समूचे विश्व पर राज करने की नीति भी अहंकार ही को दर्शाता है अर्थात अहंकार का विशालकाय रूप व्यक्ति से लेकर समूचे विश्व को अपने घेरे में लिए हुए हैं... अहंकार का इतना विस्तृत रूप लेने का कारण अहंकार का इतना विस्तृत रूप लेने का मुख्य कारण है मनुष्य की अहंकार की प्रति सीमित समझ या ये कहे कि अहंकार क्या है इसकी वास्तविक समझ ना होना... अहंकार क्या है ...

मन व उसके आयाम...

Image
मन के बारे में हम अक्सर सुनते हैं की मन बड़ा चंचल है, स्थिर नहीं, इसमें ठहराव नहीं, इसे आराम नहीं... इस पल घर के विषय में विचार करता है तो दूसरे पल दुनिया का विचार, इसे एक स्थान या एक विचार पर रहना पसंद नहीं इसलिए इसे बंदरनुमा मन भी कहा जाता है। बंदरनुमा क्योंकि बंदर एक डाल पर इस पल और दूसरी डाल पर दूसरे पल होता है उसी प्रकार मनुष्य का मन भी कभी स्थिर नहीं रहता है। किसी भी व्यक्ति से जब हम बात करते हैं या फिर हम जब एकांत में स्वयं से ही बात करते हैं तो हमें यह ज्ञात भी नहीं कि अनेकों बार एक शब्द को प्रयोग में लाते हैं और वह शब्द है 'मन'। आज मेरा 'मन' कुछ चटपटा खाने का है, 'मन' बहुत दुखी है, 'मन' विचलित है 'मन'आज अत्यधिक प्रसन्न है इत्यादि इत्यादि । प्रत्येक व्यक्ति 'मन शब्द' को प्रयोग में लाता हैं, मनुष्य मन की शक्ति के प्रभाव में काम करता है परंतु इस बात से अनभिज्ञ है कि आखिरकार ये "मन है क्या"?? जब हम कहते हैं कि 'मन' आज मेरा अधिक सोने का हैl तो इस पर विचार करे की 'मेरा' सोने का मन हैं... 'मेरा...

विचारों की शक्ति व उसके प्रभाव

Image
                                                                            विचार क्या है इस मायावी संसार में दो चीजों का अस्तित्व प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होता है.... एक प्रकृति जो इस मायावी संसार में हर ओर अपनी छटा बिखेरी हुई हैं नदियों, झरनों, वनों, पर्वतों के रूप में..इसे ईश्वर की कृति कहे या ईश्वर ने स्वयं को प्रकृति के रूप में निरूपित किया है।    दूसरा यह भौतिक संसार जो मानव के मस्तिष्क में उठे विचारों का परिणाम है भौतिक संसार में निर्मित प्रत्येक छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी वस्तु जो इस भौतिक संसार को बनाने में योगदान देती है मानव के मस्तिष्क का ही परिणाम है... अर्थात विचार मानव के मस्तिष्क में उठने वाली वे तरंगे है जो अत्यधिक शक्तिशाली है एक व्यक्ति अपने मस्तिष्क में एक विचार लाता है यह विचार ही है जो कर्म का पूर्व गामी है, कर्म से आदत और आदत से संस्कार का निर्माण होता है य...

प्रार्थना

Image
ईश्वर व मानव के मध्य की डोर जिस भक्ति पूर्ण संवाद से जुड़ी होती है वह 'प्रार्थना' कहलाती है, अर्थात ईश्वर व भक्त के बीच का संवाद प्रार्थना है। आध्यात्म एक मानसिक प्रक्रिया है उस परम तत्व, परम सत्य को प्राप्त करने की जो अदृश्य है एवं जिसकी खोज हेतु मानव आध्यात्मिक मार्ग का सहारा लेता है। मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों पर निर्भर करती है उसके यही संस्कार उसे असत्य से सत्य की ओर चलने हेतु मार्ग प्रशस्त करते हैं। या फिर जो व्यक्ति जीवन में अत्यधिक दुख, कष्ट व बार बार जीवन के अनेकों पढ़ाव पर ठोकर खाता है तो वह उन कारणों को गहराई से जानने का प्रयास करने लगता है कि मैं ही क्यों? मुझे ही इतना कष्ट क्यों?  दुख क्यों? दुख क्या है? सुख क्या है??? इत्यादि इत्यादि। इन्हीं प्रश्नों -उत्तरों की खोजों उसे जाने-अनजाने आध्यात्मिक यात्रा की ओर ले जाती है। आध्यात्मिक यात्रा की और जो व्यक्ति दृढ़ता के साथ बढ़ता है तो उसे के समक्ष जो प्रथम कार्य होता है वह स्वयं का आत्म विश्लेषण करना , मनुष्य को स्वयं से ऊपर उठकर.. स्वयं के अस्तित्व से परे जा अहंकार पर विजय पानी होती...

मैं कौन हूँ ....

Image
  जब आप अध्यात्मिक मार्ग की यात्रा करते हुए या फिर अध्यात्म को समझना चाहते हैं, तो जो प्रश्न सबसे पहले हमारे भीतर से ही आवाज देता है... वह है मैं कौन हूं ?? क्या मैं वास्तव में एक शरीर मात्र हूं या शरीर से हटकर भी कुछ और मेरा वास्तविक स्वरूप है, इस शरीर के बोध के कारण ही मैं इस संसार रूपी माया में उलझा रहता हूं। बार-बार यह प्रश्न मेरे मन में आकर मुझे भीतर से झंझोर देता है जब तक मनुष्य इस प्रश्न का उत्तर नहीं खोज लेता तब तक उसकी आध्यात्मिक यात्रा अधूरी है। जगतगुरू आदि शंकराचार्य से उनके पूज्य गुरुदेव जी गोविंद पाद ने पूछा कि तुम कौन हो? तो उत्तर जो दिया इसे आज हम निर्वाण षटकम् के माध्यम से जानते हैं... न मन हूं न बुद्धि न चित्त अहंकार.... "मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ यह एक ऐसा प्रश्न है जिसके बोध मात्र से मनुष्य योनि के गंतव्य को प्राप्त हुआ जा सकता है, एवं मनुष्य योनि से तरा जा सकता है। जब भी यह प्रश्न आप किसी व्यक्ति से करते हैं कि आप कौन हैं, तो अमुक व्यक्ति अपना परिचय अपने न...

भारत के संविधान पर वार

Image
26 जनवरी 1950 भारत गणतंत्र हुआ... एक लंबे संघर्ष तथा हमारे पूर्वजों के अथक और दृढ़ प्रयासों से भारत ने अपने संविधान का निर्माण कर उसे स्थापित किया और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप मैं भारत विश्व पटल पर उभरा और इन 71 वर्षों मैं भारत एक मजबूत लोकतंत्र के रूप मैं पुरे विश्व मैं स्थापित हुआ... हमारे पूर्वजों के प्रयासो से हमने हज़ारो वर्षों के लंबे संघर्ष के पश्चात स्वतंत्रता को प्राप्त किया इसी का परिणाम हैं की हम आज एक आजाद भारत मैं रेह कर अपने विचारों को स्वतंत्रता पूर्वक रख और व्यक्त कर सकते हैं.... किन्तु आजादी के 72 वे गणतंत्र पर जो देश मैं हुआ उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती... ये किसान आंदोलन के रूप मैं देश के लोकतंत्र को चुनौती हैं तभी इन्होंने गणतंत्र दिवस का दिन चुना, लाल किले पर एक विशेष सम्प्रदाय व संघठन का पताका लेहराना संविधान को ख़तम करने के प्रयास हैं... ये लोग ना सांसद ना न्यायालय और ना मीडिया को महत्व दे रहे हैं और कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका व प्रेस ही संविधान के चार सतम्भ हैं जिनको ये लोग नकार चुके हैं... तो कौन हैं ये लोग जो किसानों के रूप मैं देश से लोकतंत...

इच्छाओं का होना स्वाभाविक... 

Image
 ऐसा कहाँ जाता हैं की मनुष्य की इच्छाएं ही दुख का  प्रमुख  कारण हैं... विभिन्न सम्प्र्दयो चाहे जैन धर्म हो य बौद्ध धर्म तृष्णा के त्याग को ही सुख का मार्ग व मोक्ष प्राप्ति का माध्यम माना गया हैं... परन्तु वास्तव मैं मनुष्य जीवन मैं    इच्छाओं का त्याग संभव हैं?. .. इसका उत्तर है नहीं।  मेरे गुरुदेव कहते हैं की इच्छाओं को त्यागो मत उन्हें दिशा दो... ताकि वे भौतिक वाद मैं जकड़ कर महत्वकांक्षी ना हो... ज़ब व्यक्ति सांसारिक माया जाल मैं फस कर अशक्त हो कर इच्छा की चाहा रखता, उस का त्याग ही तृष्णाओं का वास्तविक त्याग हैं... भारतीय शास्त्रों मैं इन्हें वासनायेें भी कहाँ गया हैं... ये तीन प्रकार की हैं -: 1. लोक वासना 2. शास्त्र वासना 3. शरीर वासना    इन्हीं वासनाओें के इर्द- गिर्द ही मनुष्य का जीवन घूमता हैं... लोक वासना इस लोक मैं अच्छे कर्म करके दूसरे लोक मैं स्वर्ग की कामना लोक वासना हैं। शास्त्र वासना से तात्पर्य.. शास्त्रों का ज्ञान पाकर अत्यंत श्रेष्ठ होने की महत्वाकांक्षा। शरीर वासना मैं शरीर के प्रति मोह व शरीर सदा ऐसा ही बना रहे इसकी...

वेराग्य और अनासक्ति.....

Image
 ईश्वर ने जब इस जगत की रचना की तो इस सृष्टि की संकल्पना को पूर्ण करने हेतु योनियों का सृजन किया। भारतीय शास्त्रों के अनुसार इस सृष्टि पर 8400000 योनियों है, इन सभी योनियों से होकर मनुष्य को मुक्ति (मोक्ष )की प्राप्ति होती है।  इनमें से मनुष्य योनि को सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि एकमात्र मनुष्य योनि के द्वारा ही जीव अपने अंतिम गंतव्य मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। शास्त्रों का कथन हैं कि मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मनुष्य जीवन से ही होकर गुजरता है, क्योंकि एक मात्र मनुष्य को ईश्वर ने 'विवेक' दिया है..... विवेक के माध्यम से ही उसके मोक्ष के द्वार खुलते हैं। शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति के चार साधनों का वर्णन है.... " नित्यानित्यवस्तुविवेक:। इहामुत्रार्थफलभोगविराग :।शमादिषट्क सम्पति :मुमुक्षत्वं चेति। " नित्य अनित्य वस्तु विवेक इस और परलोक के भोग से वैराग्य, शमादि छ : संपत्ति और मुमुक्षा है। गुरु आदि शंकराचार्य ने इसका विस्तार से वर्णन अपनी पुस्तक "विवेक चूड़ामणि "में किया है। मोक्ष की प्राप्ति हेतु ...

विश्व मैं मानव के डगमागते कदमों का एक मात्र सहारा आध्यात्म....

Image
            "जिसका प्रकार प्राण के बगैर शरीर निर्जीव है, उसी प्रकार धर्म,  अध्यात्म, आस्था,  भक्ति, योग व तत्वज्ञान के बगैर यह जगत अस्तित्वहीन है"        मौजूदा दौर में विश्व भर में मानव के पग  सत्य की विपरीत दिशा में काफी तीव्र गति से बड़े हैं,  इसके घातक परिणाम वर्तमान मैं परिलक्षित हो रहे हैं... ऐसे में बिना विलंब किए हुए सत्य के मार्ग पर पुनः लौटना अत्यंत आवश्यक है.. सत्य का बोध एवं सत्य के मार्ग की ओर अग्रसर करने वाला एकमात्र साधन अध्यात्म है...  हमारे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीवन क्या है, हमारा इस मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है इस बात की अनुभूती ही अध्यात्मिक व्यवहार और इश्वर को अनुभव करने का मार्ग है.          हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही ऋषि,  मुनियों, आचार्य व महान संतों ने सदैव इस बात का समर्थन किया की ... इस सत्य का ज्ञान अध्यात्म से होकर ही गुजरता है. जीवन के  वास्तविक ज्ञान की अनुभूति हेतु ऋषि मुनियों ने विभिन्न मार्ग बताएं जिनमें प्रमुख हैं योग, ध्या...

विश्व शांति हेतु यज्ञ की महत्वता....

Image
भारतीय दर्शनशास्त्र तथा धार्मिक ग्रंथो मैं यज्ञ की प्रक्रिया को विश्व मैं शांति स्थापित करने का प्रमुख साधन माना गया हैं...              यज्ञ एक प्रकार का एक विज्ञान हैं, जिस प्रकार अमुक स्वर -विन्यास से युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग -रागनियां बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है......उसी प्रकार यज्ञ के दौरान ब्रम्हांड की समस्त शक्तिओ का आवाहन  कर.. मंत्रउच्चारण के साथ उत्पन्न हुई विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगो का प्रभाव  विश्वव्यापी प्रकृति, सूक्ष्म जगत तथा प्राणियों के स्थूल और सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता हैं... तथा ये शक्ति और ध्वनि आकाश मैं व्याप्त हो कर लोगों के अंतकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती हैं...       ऋषियों ने "अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः" (अथर्ववेद 9.15.14) कहकर यज्ञ को संसार की सृष्टि का आधार बिंदु कहा है।    यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का सत्य प्रयोजन तथा वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए संगठित करना भी है. आज मानव अनेकों प्रकार से अशा...

कोरोना वायरस आखिर किस का परिणाम....

Image
       विश्व में आज भय का पर्यायवाची कोरोना वायरस के रूप मैं सामने आया है. विश्व के समक्ष कई चुनोतिया और समस्याएं है...उनमे से दो सबसे बड़ी समस्याएं आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन है, दोनों ही समस्याएं मानव जगत के भविष्य पर प्रश्नचिह्न उठाती है।                वर्तमान समस्या कोरोना वायरस के बारे मैं बात करे तो कोरोना वायरस ऊपर वर्णित दोनों समस्याओं को पीछे छोड़ते हुए आज विश्व और मानव जगत के लिए सबसे बड़ी समस्या के रूप मैं उभरी है... यदि गौर से इस समस्या को देखा जाये तो यहां समस्या ऊपर वर्णित दोनों समस्याओं मैं से किसी एक से उभरी है।      या तो कोरोना आतंक, भय, और अपना वर्चस्व स्थापित करने हेतु एक जैविक हथियार है या फिर विश्व मैं मानव द्वारा प्रकर्ति के शोषण का परिणाम. कुछ तथ्य और जानकारी के आधार पर हम इन दोनों समस्याओं को समझने व उनसे उभरी कोरोना वायरस की संभावनाओ पर नजर डालते है।             सर्वप्रथम आतंक, और वर्चस्व के लिए यह एक जैविक हथियार के रूप में होने की संभावना को नकारा नहीं ...

भारत को शिखर पर पहुंचाने हेतु एकता की पहल आवश्यक...

18वी सदी का अंत व 19वी सदी का आरम्भ देश में पुनर्जागरण का रहा. भारत माता गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई थी व घोर अंधकार पूरे देश में व्याप्त था. अनेक सामाजिक कुरीतियों ने देश में पैर पसार लिए थे तथा भारतीय अपने धर्म, संस्कृति और सभ्यता को लगभग भूल चुके थे. यह वह समय था जब देश पर  घनघोर काले बादल छाए थे आशा की कोई किरण दूर-दूर तक नहीं थी.                उस विपरीत समय पर भारत ने उठने के लिए कदम बढ़ाए और सामाजिक कुरीतियों तथा ब्रिटिश अत्याचारों से लड़ते हुए, देश को इस स्थिति से बाहर निकाला, यही काल इतिहास में भारतीय पुनर्जागरण के नाम से जाना जाता है. भारत को इस स्थिति से बाहर लाने में हमारे सामाजिक एवं धर्म सुधारकों की भूमिका अति महत्वपूर्ण थी, जिसमें प्रमुख थे राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद इत्यादि.               इन सुधार को ने विधवा विवाह,  बाल विवाह,  दलितों के अधिकारों, नारी शिक्षा की ओर विशेष धयान दिया जिसमे प्रमुख थे राजा राममोहन राय, ईश्व...

भारत मैं वर्तमान स्थिति के पीछे चाइना...

भारत एक समृद्ध साली संस्कृति और विरासत का देश है, इसका विस्तृत इतिहास, वैदिक ज्ञान व अध्यात्मिक गुण इसे विश्व मैं अलग स्थान दिलाते हैं. किंतु आज वर्तमान में देश मैं  राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कारण माहौल चिंताजनक है.कारण क्या है....             इसे जानने से पूर्व हम थोड़ा पीछे भारत की राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति पर नजर डालनी होगी. 1947 में आजादी प्राप्त करने के बावजूद भारत कई समस्याओं में जकड़ा रहा जिसमें कई सामाजिक कुरीतियां जैसे तीन तलाक,  दहेज प्रथा, बाल विवाह, शिक्षा,  स्वास्थ्य,  स्वच्छता से जुड़ी समस्या शामिल है. राजनीतिक समस्याओं में अनुच्छेद 370,  35a, नागरिक संशोधन अधिनियम, एनआरसी, राम मंदिर विवाद व समान नागरिक संहिता जैसी समस्याएं शामिल रही. आर्थिक समस्याओं में बेरोजगारी,  जनसंख्या नियंत्रण और असमानता व गरीबी इत्यादि है.               इन्हीं समस्याओं के कारण भारत की विकास की गति बेहद मंद रही. जिसे मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में आते ही सुलझाने जाने का बीड़ा उठा...